Sunday, 19 August 2018

इतवार...एक लघु कथा

आज फिर इतवार है...

वही इतवार जिसका छोटू और बबली बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं...करें भी क्यों ना? इतवार के दिन उन्हें जलेबी जो खाने को मिलती है और कभी कभी तो कमली उन्हें गुब्बारे और खिलौने भी लाकर देती है..

कमली कौन? उनकी माँ...

पर ये सब सिर्फ इतवार को ही होता है....शायद इसीलिए दोनों को आज के दिन का इंतज़ार रहता है...

जगिया आज फिर उदास है....मगर वो अपने बच्चों की ख़ुशी में खलल नही डालना चाहता.. इसीलिए वो हर इतवार को बाहर वाले नीम के पेड़ के पास बैठ जाता है और नीम से गिरती हुई पत्तियों को देखा करता है...रोज कितनी ही पत्तियां गिरती है पेड़ से..पर उन्हें कोई चोट नही लगती वो जैसे पेड़ से टूटती हैं बिल्कुल उसी हालत में नीचे गिरती हैं लहराती हुई..या यूँ कहें ख़ुशी से झूमती हुई.. शायद पेड़ से आज़ाद होने की ख़ुशी मनाती हैं....उस कड़वे नीम के पेड़ से कोई भी ख़ुश नही है....उसकी खुद की पत्तियां भी नही....तभी तो शायद एक एक करके उससे दूर हो रही हैं...

ये वही पेड़ है जिसकी सूखी डाल को काटते समय एक साल पहले जगिया गिर गया था और उसके बाद फिर कभी अपने पैरों पर खड़ा नही हो पाया....

तब से कमली ही घर का खर्च चलाती है..कमली दिनकर बाबू की हवेली पर बाई का काम करती है..वहाँ से हर महीने पगार के अलावा रोज का बचा हुआ खाना भी मिल जाता है..और दिनकर बाबू के बच्चों के उतारे हुए कपड़े भी छोटू और बबली के लिए मिल जाते हैं..

पर आज इतवार है आज दिनकर बाबू घर पर होते हैं और आज ही के दिन वो अपना कमरा कमली से साफ करवाते हैं..और जब कमली सफाई करती है तब दिनकर बाबू कमरे में ही होते हैं..उन्होंने ठकुराइन को बोल रखा है कि मैं अपने सामने कमरा साफ करवाऊँगा..इन नौकरों का क्या भरोसा कोई क़ीमती सामान उठा के चलते बनें....

और कमरे की सफ़ाई के बाद वो कमली को कुछ इनाम जरूर देते हैं..इनाम यानी कि कुछ पैसे..जिससे वो बच्चों के लिए जलेबियाँ ले जाती है...

पर इनाम पाकर भी कमली ख़ुश नही दिखती... हाँ बच्चों के सामने वो हँसती जरूर है पर जगिया उसकी हँसी के पीछे का पछतावा देख लेता है..शायद वो सब जानता है फिर भी वो कमली को हर इतवार रोक नही सकता आखिर बच्चों की ख़ुशी का सवाल है...वो ख़ुशी जो शायद कमली ही उनके लिए ला सकती है...

ये इतवार हर बार आता है..किसी के लिए खुशियाँ और किसी के लिए पछतावा लेकर...

By अमित मिश्रा 'मौन'

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