Friday, 31 August 2018

आज का इंसान इतना सयाना क्यों है

ये आज का इंसान इतना सयाना क्यों है
अब आदमी ही आदमी से अनजाना क्यों है

झूठों की बस्ती है क़ीमत लहू की सस्ती है
फिर सच बयानी पे जान का जुर्माना क्यों है

तकनीक से बच्चे हुए हम बाप बन गए
दुलार में बिगाड़ें और पूछें बेटा मनमाना क्यों है
 
बातें लाज शरम की दो टके की हो चली
बेटी माँ से बोली आपका अंदाज़ पुराना क्यों है
 
लैला के नखरों से चाँदनी भी घबराने लगी
चाँद मजनूं से पूछे तू हुस्न का दीवाना क्यों है
 
सूरत पे लाली सीरत है काली हर किसी की यहाँ
असल को परे रख नकाबी चेहरा सजाना क्यों है

मार धक्का दूसरे को आगे निकलने की होड़ है
बढ़ रहे कदम अपने पर औरों को गिराना क्यों है

खाली हाथ आया और हाथ खाली ही रुख़्सती तय है
भर के माल किसी कंगाल को अमीरी दिखाना क्यों है

मियाँ की दौड़ कभी मस्ज़िद तलक रहती थी
अब ये आदम उस ख़ुदा से ही बेगाना क्यों है
 
घड़ा पाप वाला हर किसी का अब भरने लगा है
'मौन' अब यही सोचूँ सभी को गंगा नहाना क्यों है


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