Wednesday, 31 March 2021

रश्क़

 रोज इसी वक़्त छत पर आओगी

तो पड़ोसी कानाफ़ूसी करेंगे
पकड़ी तुम जाओगी
और शामत मेरी आएगी

बिन बात मुस्कुराती हो
बेवज़ह चौंक जाती हो
जो किसी को भी शक हुआ
अपनी जासूसी हो जाएगी

अब आ ही गयी हो
तो बालों को खुला छोड़ो
चूम के ऊँगली उछाली है मैंने
गालों से ज़ुल्फें हवा उड़ाएगी

रोज रोज चुनर लहराओगी
तो बादलों को तकलीफ़ होगी
वो गुस्से में बड़बड़ाएंगे
और बारिश हो जाएगी

इन बालियों को कहो
इतना भी ना चमकें
कहीं सूरज जल गया अगर
मोहल्ले में रोशनी ना आएगी

यूँ जोर जोर गुनगुनाओगी
तो कोयल को रश्क़ होगा
वो बिगड़ी तो महीनों तक
फ़िर प्रेम गीत ना सुनाएगी

सोचो किसी शाम ऐसा भी हो
तुम आओ और मैं ना मिलूँ
बमुश्किल रात कटेगी तुम्हारी
बेचैनी रहेगी, नींद नही आएगी

मैंने तो लिख दी है कविता
अब तुम भी एक चिट्ठी लिखो
कब तक तुम्हारे दिल का हाल
मुझसे तुम्हारी सहेली बताएगी।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


9 comments:

  1. इन बालियों को कहो
    इतना भी ना चमकें
    कहीं सूरज जल गया अगर
    मोहल्ले में रोशनी ना आएगी

    क्या बात .... यानि आपको विश्वास कि वो अपनी सहेली को बताती होगी हालेदिल ....

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
    अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की बधाई हो।

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  3. सुन्दर सृजन ।

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. बहुत सुंदर

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  5. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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