Friday, 5 January 2018

Chand paise kamaane ko gaanv se sahar aya

चंद पैसे कमाने को गाँव से शहर आया
मिलती है शहर में खुशियां लोगों ने बताया


देखा उनकी नज़र से तो उम्मीद का सूरज नजर आया
पहली बार गाँव से निकलने को अपना कदम बढ़ाया

छोड़ के वो पुरानी यादें और वो पुराना घर आया
वो टूटी सड़कें और पेड़ो की छाँव न भूल पाया

तय करके मीलों का सफर इस शहर में आया
हर तरफ ऊँची इमारतें और गाड़ियों का शोर पाया

मिले कुछ तजुर्बे ऐसे तब जाके ये समझ आया
सपने बुने थे कुछ और हकीकत में कुछ और पाया

चंद पैसों की खातिर यहाँ अपना ईमान गंवाया
पाने को कुछ खुशियां इच्छाओं को दांव पे लगाया

जो निकला हूँ गाँव से एक बार वापस नही जा पाया
उम्मीद थी उजाले की पर हर तरफ अँधेरा नजर आया

यादों की जंजीरें तोड़ के हर रोज नया सपना सजाया
टूटे सपने हर बार मगर खुद ही खुद को समझाया

सफर मीलों का तय किया पर मंजिल तक न पहुँच पाया
अगर सफर ही है मंजिल तो क्यों इतनी दूर निकल आया

आज पैसे तो हैं जेब में पर वो सुकून नही मिल पाया
क्या यही वो शहर है जिसकी खातिर मैं गाँव छोड़ आया

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