Sunday, 9 December 2018

रात ठहरी है

रात  ठहरी  है  उस  पहर से
वो जब से गया इस शहर से

ना हुआ दीदार आख़िरी उसका
गिर गया हूँ अपनी ही  नज़र से
 
ना रही  मंज़िल की ख़्वाहिश
वापस लौटा मैं एक सफ़र से

प्यासा  ही  रहा  हूँ  बिन  उसके
अब तंग हूँ मैं साक़ी के ज़हर से

है अधूरी हर नज़्म बिन उसके
रहती हैं ग़ज़लें भी दूर बहर से

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