Sunday, 24 February 2019

मैं तुझसे लड़ने आया ग़म

रब से कोई दुआ थी माँगी
फल में जिसके  पाया ग़म

सबके हिस्से आई खुशियाँ
मेरे   हिस्से   आया   ग़म

भोर दोपहर या हो संध्या
बदली बन के  छाया ग़म

भारी सा दिल गीली आँखें
मुझको बहुत  रुलाया ग़म
 
क्या चाहे तू क्या है इच्छा
क्यों तूने मुझे सताया ग़म
 
एक  ज़िंदगी, चंद  हैं  साँसें
क्यों कर दूँ इसको ज़ाया ग़म

सुन, मैं पत्थर  हो  जाऊंगा
ग़र अपनी पे जो आया ग़म
 
जोश मिलाया जब हिम्मत संग
डरा   बहुत   घबराया   ग़म

धमकी दी मुझको क़िस्मत की
फ़िर  और  मुश्किलें लाया ग़म

मज़बूत इरादे,संग इच्छाशक्ति
मैं  तुझसे  लड़ने  आया  ग़म

क़ोशिश कर ली ज़ोर लगाया
कुछ  भी  ना कर  पाया  ग़म

हार मानकर वापस भागा
ग़लती  पे  पछताया  ग़म

तूने  सोचा ना  हो पाएगा
करके मैनें दिखलाया ग़म

अमित 'मौन'
  

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/02/2019 की बुलेटिन, " भारतीय माता-पिता की कुछ बातें - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  2. तूने सोचा ना हो पाएगा
    करके मैनें दिखलाया ग़म

    सुन्दर प्रेरक पंक्तियाँ।

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