Sunday, 23 June 2019

बढ़ता जा रे

प्यार में धोखा बात पुरानी
ग़म काहे को  करता प्यारे

नदी, धरा और  ऊँचे पर्वत
सब के सब ही ग़म के मारे

बरखा, बारिश, ओस की बूंदें
नम  आँखों  के  यही  नज़ारे

हुस्न यार का झूठी बातें
देख जरा तू चाँद सितारे

क्षमा, त्याग ही असली पूँजी
रूह  तेरी  भी  यही  पुकारे

नफ़रत, गुस्सा और मायूसी
छोड़ के इनको बढ़ता जा रे!

अमित 'मौन'

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