Saturday, 24 August 2019

शब्दों की माला

मैं  चाहूँ  तुझे  ही, ये  कैसे  बताऊँ
जो पढ़ के ना समझे तो कैसे जताऊँ

देखूँ तुझे तो मैं, ख़ुद ही को भूलूँ
यूँ  चेहरे से नज़रें  मैं कैसे हटाऊँ

ना दूरी  कोई, रह गयी  दरमियाँ है
है सूरत बसी दिल में कैसे दिखाऊँ

आँखें  जो  मूंदूँ, तू  ही  सामने हो
मैं ख़्वाबों में अपने तुझे ढूँढ़ लाऊँ

सोहबत की चाहत, बड़ा कोसती है
ये  दूरी  है  दुश्मन  ये  कैसे  मिटाऊँ

ये शब्दों की माला, तुझे करके अर्पण
कविता  में अपनी  मैं तुझको सजाऊँ

अमित 'मौन'

6 comments:

  1. सादर आभार आपका....जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं आपको

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  2. बहुत सुंदर अर्पण ,समर्पण आपके सृजन से ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  3. वाह वाह क्या माला पिरोई है शब्दों की | बहुत ही कमाल बहुत ही अनुपम |

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  4. हार्दिक आभार आपका

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