Monday, 22 February 2021

स्थिरता

कितनी ही दीवारें हैं

जिन्हें घर होने का इंतज़ार है

और मुसाफ़िर हैं कि
बस भटकते हुए दम तोड़ रहे हैं

जाने कितना ही वक़्त
खोजते हुए खर्च कर दिया
पर जो ढूँढ़ लिया
उसे संभालने का समय नही मिला

जल्द पहुँचने की ख़्वाहिश लिए
सुकून भरी छाँव छोड़ते रहे
पर कौन जाने इस लंबे सफ़र में
कोई और पेड़ मिले ना मिले

हम भागने के इतने आदी हो गए
कि रुकने को अस्थिरता समझने लगे
जबकि इस भाग-दौड़ का मक़सद
एक स्थायी पते की तलाश था

मन को इच्छाओं का ग़ुलाम बना लेना
अपने शरीर के साथ क्रूरता करना है।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-02-2021) को     "नयन बहुत मतवाले हैं"  (चर्चा अंक-3987)    पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. बहुत गहन भाव उकेरे हैं आपने।
    सादर।

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  3. सच मं भागने के आदी हो गये हैं हम.

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  4. वाकई भागम भाग ज़िन्दगी के आदी हो चले हैं । अच्छी प्रस्तुति ।

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  5. वाकई वह स्थायी ठिकाना मिल जाए तो बात बन जाए

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  6. बहुत खूब ल‍िखा अम‍ित जी, क‍ि ...जल्द पहुँचने की ख़्वाहिश लिए
    सुकून भरी छाँव छोड़ते रहे
    पर कौन जाने इस लंबे सफ़र में
    कोई और पेड़ मिले ना मिले..वाह

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  7. बहुत सुंदर रचना।

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  8. बहुत सुंदर

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  9. सुंदर रचना!
    हम भागने के इतने आदी हो गए
    कि रुकने को अस्थिरता समझने लगे
    जबकि इस भाग-दौड़ का मक़सद
    एक स्थायी पते की तलाश था।
    ब्रजेंद्रनाथ

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