प्रेम
कभी सामने से नहीं आता
वह आता है
बिना दस्तक
बिना आहट
जैसे नींद
थकी हुई आँखों में
ख़ुद ही उतर आती है
कभी वह छुपा होता है
मोबाइल की गैलरी में
किसी धुंधली तस्वीर के कोने में
या फिर
पुरानी चैट के बीच
जहाँ आख़िरी संदेश
अब भी “ख़याल रखना” है
प्रेम लौटता है
और आ बैठता है
कुर्सी खिसकाने की आवाज़ पर
या बालों में उँगलियाँ फिराते वक़्त
जब हाथ
अपने आप रुक जाता है
कभी-कभी
वह बन जाता है
एक अधूरा वाक्य
जो बोलते-बोलते
होंठों पर ही रह जाता है
या कोई सवाल
जिसका जवाब
अब ज़रूरी नहीं लगता
प्रेम
किसी पुराने स्वेटर की तरह है
जो अब पहना नहीं जाता
पर फेंका भी नहीं जाता
ठंड अचानक बढ़ जाए
तो वही
सबसे पहले याद आता है
और यूँ
बिना कहे
बिना लौटने का वादा किए
प्रेम
फिर से
मौजूद हो जाता है
अमित ‘मौन’

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