Monday, 8 January 2018

Ye sard hawa aur tum

ये सर्द हवायें भी आज जाने क्यों लग रही हैं तुम्हारी तरह

ये छूती हैं मुझे तो एक सिहरन सी होती है तुम्हारी तरह

ये कानों में मीठा सा शोर मचाती हैं तुम्हारी तरह

ये करीब आ जायें तो सांसें रुक जाती है तुम्हारी तरह

ये मेरे होठों को सुर्ख कर जाती हैं तुम्हारी तरह

ये सीने से लग जायें तो धड़कनें बढ़ाती तुम्हारी तरह

ये भीतर कहीं घुस के गुदगुदाती हैं तुम्हारी तरह

ये मुझे मदहोश कर जाती हैं तुम्हारी तरह

ये बिना बताये कभी कभी आती है तुम्हारी तरह

ये जब भी आये अपना असर छोड़ जाती है तुम्हारी तरह

हाँ ये भी है बिल्कुल तुम्हारी तरह एकदम तुम्हारी तरह

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