Monday, 14 January 2019

बैठना ना हार कर..

गिरा है जो उठा ना हो, जो उठ गया गिरा नही
जो पास है तेरा ही है, जो ना  मिला  तेरा नही

आदि है अनंत है, प्रयत्न का ना  अंत है
मार्ग जो दिखाएगा, प्रयास ही वो संत है
 
डर नही अंधेरों से, अगले पहर में भोर है
बंद  नेत्र  खोल  दे, प्रकाश  चारों ओर  है
 
जला ना जो तपा ना जो, हुआ है वो बड़ा नही
पक के फिर  पाषाण बन, मिट्टी का  घड़ा नही

समुद्र  सा  हो  शांत  पर, नदियों  जैसा  वेग  हो
बेताबियाँ हों इस क़दर, कि लहरों से भी तेज़ हो

ख़ुद  पे  हो  यक़ीन  भी, हौसला  बुलंद  हो
है जीत निश्चित तेरी, जो मुश्किलों से द्वंद हो

जज़्बों की पतंग को, आसमां में  छोड़ दे
डर की हैं जो बेड़ियाँ, आज सारी तोड़ दे

जो मंज़िलों पे हो नज़र, तो रास्तों से कैसा डर
जीत  का  जुनून  रख, तू  बैठना  ना  हार कर

अमित 'मौन'

विश्वास

विश्वास हमारी गाड़ी में लगे पहिये के मानिंद है..

पहिया जो कि निरंतर चलता रहता है बिना रुके और हम मानते हैं कि वो पहिया पहुंचाएगा हमें हमारी मंज़िल तक और हम बढ़ते जाते हैं उस पहिये के साथ अपने गंतव्य की ओर...

पर वही पहिया अगर एक बार कहीं रास्ते मे पंचर हो गया तो हम उसे ठीक कराने के बाद भी डरे रहते हैं और अपने मन में आने वाले उन विचारों को रोक नही पाते जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या ये पहिया हमें मंज़िल तक पहुंचाएगा, क्या ये पहिया बिना रुके चल पाएगा...

क्यों? क्योंकि वो पहिया एक बार हमारी उम्मीदों को ध्वस्त कर चुका है...

इसलिए कोशिश कीजिए की उन रास्तों पर जाने की जरूरत ना पड़े जहाँ उस पहिये के पंचर होने का खतरा हो ताकि विश्वास का ये पहिया कभी पंचर ना होने पाए...

अमित 'मौन'

आकर्षण और प्रेम...

आकर्षण एक नवजात शिशु की मानिंद होता है जो शुरू में तो बहुत निर्मल, निश्छल, प्यारा और मोहक लगता है क्योंकि वो अभी अभी हमारे जीवन में, हमारे परिवेश में या हमारे आस पास आया है, परंतु शनैः शनैः हमारा यह मोह भंग होने लगता है क्योंकि अब हम उसे निरंतर अपने आस पास पाते हैं...उसकी सभी बातें, सभी हाव भाव, सभी खेल जो हमारे लिए कभी नये थे अब वो रोजमर्रा की बातें हो गई हैं अब कुछ भी नया नही रहा और इस प्रकार उस आकर्षण का भी एक दिन अंत हो जाता है...

पर क्या प्रेम ऐसा करता है या प्रेम में ऐसा होता है?

नही....।।

प्रेम का उदाहरण है मातृत्व....मातृत्व जो कभी उस शिशु को किसी कसौटी पर नही परखता..उसके लिए शिशु का होना ही सब कुछ है...एक माँ के लिए उसके बालक के सभी भाव, सभी खेल, सभी नादानियाँ आज भी उतनी ही प्रिय हैं जितनी उसके जन्म के समय थी....मातृत्व की संतुष्टि उसकी संतान के होने मात्र से ही है..एक माँ का मन अपने बालक को देख कर कभी नही भरता...उसे संतान की बदलती चंचलताओं, विचारों, रंग रूप, कद-काठी इत्यादि से कोई फर्क नही पड़ता...वो उसके बदलाव को स्वीकार करते हुए भी उतना ही प्रेम करती है या यूँ कहें बदलाव को स्वीकार करते हुए उसका प्रेम और भी प्रगाढ़ होता जाता है...

इसलिए अपने आकर्षण को प्रेम समझने से पहले एक बार जरूर विचार करें कि आप किसी व्यक्ति से प्रेम करते हैं या उसके व्यक्तित्व से...क्योंकि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व समय के साथ बदल भी सकता है तो क्या आप बदलाव को स्वीकार कर पाएंगे...

अमित 'मौन'

Sunday, 6 January 2019

चाँद...

रात अमावस गहरी काली
जाने क्यों ना  आया  चाँद

ओढ़ी बदरी सोया फिर से
थोड़ा सा  अलसाया  चाँद

सहमी चिड़िया डरी गिलहरी
थोड़ा  और  इतराया  चाँद

जाने क्या फिर मुझको सूझा
मैं  छत  पे  ले  आया  चाँद

देख रोशनी मेरे चाँद की
थोड़ा सा  घबराया चाँद

आलिंगन से चाँद जल गया
जब बाहों में  शरमाया चाँद

भौंह सिकोड़ी आँख तरेरी
पर कुछ ना कर पाया चाँद

भाँप बेबसी उस चंदा की
थोड़ा और जलाया  चाँद

तेरी चाँदनी नाज़ करे क्यों
हमने  भी  तो  पाया  चाँद
 
हार मान ली बाहर निकला
गलती  पे  पछताया  चाँद

हुई पूर्णिमा पूरा  चंदा
नई रोशनी लाया चाँद

अमित 'मौन'

प्रेम...

पूर्व काल में प्रेम परिभाषित नही था, प्रेम पर उपमाएं नही गढ़ी गयी थी और ना ही कोई प्रचलित प्रेम कथा थी बस प्रेम था अपने वास्तविक रूप में...प्रेम के अथाह सागर में गोते लगाते हुए प्रेम को महसूस किया जाता था, प्रेम को जिया जाता था..

क्योंकि तब प्रेम में प्रतियोगिता नही थी प्रेम का कोई मापदंड नही था...शायद इसीलिए उस काल में प्रेमी अमर हुए और उनका प्रेम हुआ अमर प्रेम....

स्मरण रहे...

प्रेम में अपेक्षा नही प्रतीक्षा की जाती है..

प्रेम किसी के प्रति अनुभूति है सहानुभूति नही...

प्रेम का पूर्वाभास नही होता प्रेम होने पर एहसास होता है..

प्रेम में आपको कुछ विशेष अपर्ण नही करना होता प्रेम में समर्पण करना होता है...

प्रेम को अपने अनुरूप नही ढालना होता प्रेम में वास्तविकता को स्वीकार करना होता है...

प्रेम को किसी कसौटी पर परखा नहीं जाता प्रेम स्वयं में सम्पूर्ण होता है...

प्रेम सिर्फ मोह या लगाव नहीं प्रेम एक भाव है...

प्रेम कोई मंज़िल या पड़ाव नही जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाए प्रेम एक अनवरत सफर है जिसमें बिना थकान एवं हताशा के सतत बढ़ना होता है....

अगर आप इन सभी बातों को मन मष्तिष्क में जगह दे पाएंगे तो प्रेम के नाम पर होने वाले अवसाद से बचे रहेंगे और प्रेम का आनंद ले पाएंगे.....

----अमित 'मौन'----

क्यों माई मुझे अब बुलाती नही है....

क्यों माई मुझे  अब बुलाती नही है
क्या तुझको मेरी याद आती नही है

बड़ी बेरहम है  शहर की ये दुनिया
जो भटके तो रस्ता दिखाती नही है

हैं ऊँची दीवारें और छोटे से कमरे
चिड़िया भी आकर जगाती नही है

कई  रोज  से  पीला सूरज  ना देखा
चाँदनी भी अब मुझको भाती नही है

ये व्यंजन भी सारे फीके से लगते
उन हाथों की तेरे  चपाती नही है
 
वो गाँव की गलियां वो झूले वो बगिया
वो यादें  ज़हन से  क्यों  जाती  नही है

ये लल्ला तेरा देख कब से ना सोया
क्यों माई मुझे  अब सुलाती नही है

बोझिल सी आँखें मेरी हो चली हैं
ये अश्कों को मेरे छुपाती नही है

क्यों माई मुझे  अब बुलाती नही है
क्या तुझको मेरी याद आती नही है

अमित 'मौन'

Thursday, 27 December 2018

चाँद रात्रि का बड़ा बेटा है...

चाँद रात्रि का बड़ा बेटा है और ये सितारे उसके छोटे भाई बहन...

दिन का समय इनका खेलने और सीखने का समय होता है तो ये घर से बाहर निकल जाते हैं...

पृथ्वी इनके लिए खेल का मैदान है इसलिए ये पृथ्वी के चारों और चक्कर लगाते रहते हैं...

अमावस में ये सभी नानी के घर छुट्टियाँ मनाने चले जाते हैं फिर पूर्णिमा तक वापस आ जाते हैं....

आसमान इनका सरंक्षक है और इसलिए ये हमेशा उसकी छत्रछाया में ही रहते हैं....

और जैसा कि विश्वविदित है परमपिता परमात्मा इनका भी पिता है और ये सब कुछ पिता की देख रेख में ही होता है..

प्रेम...

बरसात में नदी का भर जाना प्रेम होना है...

फिर समंदर की तरफ तेजी से बढ़ना और उस तक पहुंचने का प्रयत्न करना प्रेम में पागल होना है...

रास्ते में मिलते बाँध, घाट और शहर प्रेम के मार्ग की बाधाएँ हैं...

फिर समंदर में ख़ुद को मिला देना प्रेम में समर्पण है...

समर्पण की प्रक्रिया में ख़ुद के वजूद की परवाह ना करना प्रेम की पराकाष्ठा है....

अनवरत और निरंतर चलती ये प्रक्रिया एक अमर प्रेम कहानी है....

'मौन'

Sunday, 9 December 2018

रात ठहरी है

रात  ठहरी  है  उस  पहर से
वो जब से गया इस शहर से

ना हुआ दीदार आख़िरी उसका
गिर गया हूँ अपनी ही  नज़र से
 
ना रही  मंज़िल की ख़्वाहिश
वापस लौटा मैं एक सफ़र से

प्यासा  ही  रहा  हूँ  बिन  उसके
अब तंग हूँ मैं साक़ी के ज़हर से

है अधूरी हर नज़्म बिन उसके
रहती हैं ग़ज़लें भी दूर बहर से

अमावस

देख  अमावस  डर  के  मारे
सोया चाँद और छुप गए तारे

छोड़ छाड़ के दाना तिनका
पंछी आ  गए  घर को  सारे

सूनी सड़कें चुप चौराहे
तन्हाई से  हम भी  हारे

वही है रातें  वही नज़ारे
बिना तुम्हारे दुश्मन सारे

सिकुड़ी चादर गीला तकिया
फिर  यादों  ने  पांव  पसारे

बैठना ना हार कर..

गिरा है जो उठा ना हो, जो उठ गया गिरा नही जो पास है तेरा ही है, जो ना  मिला  तेरा नही आदि है अनंत है, प्रयत्न का ना  अंत है मार्ग जो दिखाए...