Friday, 12 October 2018

घर से निकले हैं पढ़ने को....

घर  से  निकले  हैं  पढ़ने  को
जीवन  के पथ  पर  बढ़ने को
कदम  है अगला आज बढ़ाया
एक रोज शिखर पर चढ़ने को

ना  पहले  सी शामें  होंगी
ना  सुबहा होगी अलसाई
जो वक़्त गँवाया मस्ती में
उसकी होगी अब भरपाई

ना  घर जैसा  खाना होगा
ना  अम्मी तुझे खिलाएगी
उठना होगा घड़ी देख कर
आवाज़ ना तुझे जगाएगी

ना डर होगा अब पापा का
वो कब ऑफिस से आएंगे
बस  तू ना  होगा खाने को
थैले  में  फल  जब लाएंगे

अब  दादा  ना  पुचकारेंगे
ना  सहलाएँगे  तेरे   गाल
अब  दादी  भी  ना  पूछेगी
कमजोर हो गया मेरा लाल

ना बहना से झड़पें होंगी
ना  कोई उसे  चिढ़ाएगा
घरवालों  के  आगे  अब
रोकर  कौन  दिखाएगा

कैसे  भाई   को  डांटेगा
हर चीज़ बराबर बांटेगा
ना सांझी अलमारी होगी
जो अपने कपड़े छांटेगा

ना हुड़दंगी महफ़िल होगी
ना  घंटों  होगा  बतियाना
जाने  कब  दोबारा  होगा
उन  यारों  से  मिल  पाना

अब उम्मीदों का बोझा है
जो तुझको पूरी  करनी है
खाली कलम है कल तेरा
स्याही तुझको ही भरनी है

अब वापस जो तू लौटेगा
ना  इन लम्हों  को पाएगा
कुछ रस्ते नये मिलेंगे फिर
जिन पर तू बढ़ता जाएगा

By Amit Mishra

  

Thursday, 20 September 2018

ग़र इश्क़ का कोई सार लिखूं

ग़र इश्क़ का कोई सार लिखूं
उसको ही बारंबार लिखूं
जो प्रेमपाश का वर्णन हो
उसकी बाहों का हार लिखूं

कविता की पहली पंक्ति वो
जब लय में कोई गज़ल लिखूं
मैं एक सरोवर हो जाऊं
और उसको अपना कमल लिखूं

उसे अल्हड़ मस्त बयार कहूँ
मौसम की कोई बहार कहूँ
लिख दूँ बरखा की बूँद उसे
सावन का पहला प्यार लिखूं

ज्यों फूलों की नाज़ुक कलियाँ
भंवरे करते जब रंगरलियां
खिलते ग़ुल का वो नज़राना
संदल सी उसकी महक लिखूं

नदियों जैसी वो बल खाये
ज्यों सागर से लहरें आये
ठंडी शामों में साहिल पे
ना मिट पाये वो नाम लिखूं

वो मंद मंद जब मुस्काए
और लट ऊँगली से सुलझाए
उन अधरों से रस पान करूं
मैं यौवन का गुण गान लिखूं

वो जब जब पायल छनकाए
और साथ मे कंगन खनकाए
मैं उसका वो श्रृंगार लिखूं
अब मिलन को हूँ तैयार लिखूं

अब मिलन को हूँ तैयार लिखूं...

ग़र इश्क़ का कोई सार लिखूं
उसको ही बारंबार लिखूं....


Sunday, 16 September 2018

छुपाया ना करो...

यूँ  तन्हा  हर  रात  सुलाया  ना  करो
फ़िर ख़्वाबों में मिलने आया ना करो

कुछ  अरमान  सुलगने  लगते हैं
यूँ बातों में इश्क़ जताया ना करो

एक ख़्वाहिश हिचकोले खाती है
दूर  रहके  प्यास  बढ़ाया ना करो

आँखों  के  रस्ते  दिल में  उतर जाएं
आशिक़ को ये राह दिखाया ना करो

चाहत  तुम्हें भी  कम नही  जानां
ज़माने को ये राज़ बताया ना करो

मंज़िल  इश्क़ की  यूँ  ही मिलती नहीं
क़दम दो चल के वापस जाया ना करो

'मौन' हो पर कुछ कहना है शायद
कर भी दो इक़रार छुपाया ना करो

Monday, 3 September 2018

सोमवार - एक व्रत कथा

आज सोमवार है....

पुष्पा आज जल्दी उठ गई है...उसे व्रत जो रखना है...तो चार बजे उठ कर दैनिक कार्यों से निवृत होकर नहा धोकर मंदिर में पूजा करेगी...

किसी भी तरह उसे छः बजे तक पूजा खत्म करके मंदिर से बाहर आना है क्योंकि छः बजे बच्चों को उठाकर स्कूल के लिए तैयार करना है उनके लिए नाश्ता बनाना है और सात बजे तक बच्चों के पिता जी को चाय भी देनी है...

तिवारी जी को बिस्तर पे चाय पीने की आदत है वरना उनका पेट साफ नही होता....तिवारी जी समय के बड़े पाबंद हैं...शादी के बाद आज तक कभी ऑफिस देर से नही पहुँचे..

ऊपर से सासू माँ को गर्म पानी भी देना है नहाने के लिये.. वो भी सात बजे से पहले..और हाँ ससुर जी भी पार्क से घूम के आ रहे होंगें उन्हें भी आते ही सबसे पहले हर्बल जूस देना होता है...

पर ये क्या...पुष्पा तो उठ के खड़ी भी नही हो पा रही.. अच्छा हाँ वो कल तिवारी जी ने पति होने का हक जताया था ना..कल रात का खाने में थोड़ी देर हो गयी थी और उनकी एक लात से पुष्पा मेज पर ही गिर गयी थी...तो शायद उसके पैर में चोट लग गयी होगी...पर इसमें नया क्या है वो तो अक्सर ऐसे ही मारते हैं...पर पुष्पा को बिल्कुल बुरा नही लगता क्योंकि सहारनपुर वाली मौसी ने समझाया था कि पति के चरणों मे स्वर्ग होता है... और स्वर्ग की प्राप्ति तो हर किसी का मकसद है....

थोड़ी बहुत चोट लग भी गयी तो क्या हुआ...चोट का बहाना बनाकर अपने कामों से जी थोड़ी चुरा सकती है....चोट तो लगती रहती है..वो काम ही ऐसे करती है कि तिवारी जी गुस्सा आ जाता है....और वैसे भी ये सब तो उसी के काम हैं उसी को करने हैं इसीलिये तो शादी करके इस घर मे लायी गयी है...काम करके किसी पे एहसान थोड़ी करती है...

और हाँ व्रत रखा है तो पूजा भी जरूरी है..आखिर बारह साल की उम्र से रखती आ रही है..माँ ने बताया था बेटी सोमवार का व्रत रखने से अच्छा पति मिलता है....शायद माँ ने ठीक कहा था...कितना अच्छा परिवार मिला है....

दो वक्त की रोटी....तन ढकने के कपड़े...कुछ नये रिश्ते...ढेर सारी जिम्मेदारियां...और सबसे बड़ी बात दो सुंदर से बच्चे मिले.. और क्या चाहिए एक बहू को....

पुष्पा बहुत खुश है अपनी ससुराल में...पुष्पा की माँ ने सबको बताया है...

खैर, आज फिर सोमवार है..आज व्रत है....

Friday, 31 August 2018

आज का इंसान इतना सयाना क्यों है

ये आज का इंसान इतना सयाना क्यों है
अब आदमी ही आदमी से अनजाना क्यों है

झूठों की बस्ती है क़ीमत लहू की सस्ती है
फिर सच बयानी पे जान का जुर्माना क्यों है

तकनीक से बच्चे हुए हम बाप बन गए
दुलार में बिगाड़ें और पूछें बेटा मनमाना क्यों है
 
बातें लाज शरम की दो टके की हो चली
बेटी माँ से बोली आपका अंदाज़ पुराना क्यों है
 
लैला के नखरों से चाँदनी भी घबराने लगी
चाँद मजनूं से पूछे तू हुस्न का दीवाना क्यों है
 
सूरत पे लाली सीरत है काली हर किसी की यहाँ
असल को परे रख नकाबी चेहरा सजाना क्यों है

मार धक्का दूसरे को आगे निकलने की होड़ है
बढ़ रहे कदम अपने पर औरों को गिराना क्यों है

खाली हाथ आया और हाथ खाली ही रुख़्सती तय है
भर के माल किसी कंगाल को अमीरी दिखाना क्यों है

मियाँ की दौड़ कभी मस्ज़िद तलक रहती थी
अब ये आदम उस ख़ुदा से ही बेगाना क्यों है
 
घड़ा पाप वाला हर किसी का अब भरने लगा है
'मौन' अब यही सोचूँ सभी को गंगा नहाना क्यों है


Sunday, 19 August 2018

इतवार...एक लघु कथा

आज फिर इतवार है...

वही इतवार जिसका छोटू और बबली बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं...करें भी क्यों ना? इतवार के दिन उन्हें जलेबी जो खाने को मिलती है और कभी कभी तो कमली उन्हें गुब्बारे और खिलौने भी लाकर देती है..

कमली कौन? उनकी माँ...

पर ये सब सिर्फ इतवार को ही होता है....शायद इसीलिए दोनों को आज के दिन का इंतज़ार रहता है...

जगिया आज फिर उदास है....मगर वो अपने बच्चों की ख़ुशी में खलल नही डालना चाहता.. इसीलिए वो हर इतवार को बाहर वाले नीम के पेड़ के पास बैठ जाता है और नीम से गिरती हुई पत्तियों को देखा करता है...रोज कितनी ही पत्तियां गिरती है पेड़ से..पर उन्हें कोई चोट नही लगती वो जैसे पेड़ से टूटती हैं बिल्कुल उसी हालत में नीचे गिरती हैं लहराती हुई..या यूँ कहें ख़ुशी से झूमती हुई.. शायद पेड़ से आज़ाद होने की ख़ुशी मनाती हैं....उस कड़वे नीम के पेड़ से कोई भी ख़ुश नही है....उसकी खुद की पत्तियां भी नही....तभी तो शायद एक एक करके उससे दूर हो रही हैं...

ये वही पेड़ है जिसकी सूखी डाल को काटते समय एक साल पहले जगिया गिर गया था और उसके बाद फिर कभी अपने पैरों पर खड़ा नही हो पाया....

तब से कमली ही घर का खर्च चलाती है..कमली दिनकर बाबू की हवेली पर बाई का काम करती है..वहाँ से हर महीने पगार के अलावा रोज का बचा हुआ खाना भी मिल जाता है..और दिनकर बाबू के बच्चों के उतारे हुए कपड़े भी छोटू और बबली के लिए मिल जाते हैं..

पर आज इतवार है आज दिनकर बाबू घर पर होते हैं और आज ही के दिन वो अपना कमरा कमली से साफ करवाते हैं..और जब कमली सफाई करती है तब दिनकर बाबू कमरे में ही होते हैं..उन्होंने ठकुराइन को बोल रखा है कि मैं अपने सामने कमरा साफ करवाऊँगा..इन नौकरों का क्या भरोसा कोई क़ीमती सामान उठा के चलते बनें....

और कमरे की सफ़ाई के बाद वो कमली को कुछ इनाम जरूर देते हैं..इनाम यानी कि कुछ पैसे..जिससे वो बच्चों के लिए जलेबियाँ ले जाती है...

पर इनाम पाकर भी कमली ख़ुश नही दिखती... हाँ बच्चों के सामने वो हँसती जरूर है पर जगिया उसकी हँसी के पीछे का पछतावा देख लेता है..शायद वो सब जानता है फिर भी वो कमली को हर इतवार रोक नही सकता आखिर बच्चों की ख़ुशी का सवाल है...वो ख़ुशी जो शायद कमली ही उनके लिए ला सकती है...

ये इतवार हर बार आता है..किसी के लिए खुशियाँ और किसी के लिए पछतावा लेकर...

By अमित मिश्रा 'मौन'

Wednesday, 15 August 2018

एक बेहतर हिंदुस्तान..

मुल्क के सिपहसालारों को भी कुछ काम दिया जाए
सफेदपोशों को दग़ाबाज़ी का  अब इनाम दिया जाए

ख़्वाहिशे अधूरी  हैं  जिनकी  ये  मुल्क  बाँटने  की
सर क़लम कर उनका मुक़म्मल मुक़ाम दिया जाए

जिहाद के बहाने कुछ लोग ज़न्नत ढूंढ़ रहे घाटी में
अब उन्हें भी उनके हिस्से का इंतक़ाम दिया जाए

ख़्वाब अधूरे हैं हिंद की ख़ातिर शहीद उन जवानों के
आओ मिल कर  उनके सपनों को अंजाम दिया जाए

भगवे-हरे  को मिला  एक  नया  कफ़न बनाना  है
मज़हबी ठेकेदारों को सुला कर आराम दिया जाए

काली रातों में पहाड़ बन जो खड़े हैं सरहदों पर
कभी उन्हें भी सुकून भरे  सुबह शाम दिया जाए

सब  कुछ  तो दिया  इस  धरती  ने  हमें  गुजारे  ख़ातिर
अब फर्ज़ हमारा की इसे वतनपरस्त आवाम दिया जाए

बहुत  हुआ  'मौन'  रहना हर रोज  सड़कों पे लहू देख
क्यूं ना नई नस्लों को एक बेहतर हिंदुस्तान दिया जाए

©अमित मिश्रा

Monday, 13 August 2018

माहताब की लाली

माहताब की लाली को बादलों में छुपाया ना करो
यूँ  बेवजह  रूखसारों  पे जुल्फें  गिराया  ना करो

बाहों  के  घेरों  में सिमटो  तो  नज़रें  झुका लो
रंग-ए-हया के चिलमन से बाहर आया ना करो

गुफ़्तगू  वस्ल  की बेशकीमती खजाना है जानां
शब-ए-इश्क के किस्से सरेआम सुनाया ना करो

ग़ुरूर  चाँदनी  का  भी  अब  हवा  हो  चला
यूँ हर बार सितारों को आईना दिखाया ना करो

नीयत महबूब की  दगाबाज़ी पे उतर ना जाए
निगाहों के मयकदे में हर बार बुलाया ना करो

बोसों की बारीश से कुछ पल की राहत बख्शो
लबों से जकड़  हर बार 'मौन' बिठाया  ना करो


Friday, 27 July 2018

धरोहर..


धरोहर.. हाँ यही नाम दिया है मैंने तुम्हारी यादों और तुम्हारे वादों को...

यादों की अलमारी में मैंने रखे हैं वो सारे पल जो हमने साथ बिताए थे, वो लम्हे जो हमने साथ जिये थे, कुछ खट्टी सी शरारतें, कुछ मीठा सा एहसास, कुछ तीखी नोंक झोंक और कुछ कड़वे अनुभव भी...पर उन कसमों को नही रखा है मैंने जो हमने साथ जीने मरने की खाई थी, अब क्या है कि उन कसमों की कसक कहीं उन यादों पर भारी ना पड़ जाए..इसीलिए उसे मैं वहीं छोड़ आया जहाँ हम आखिरी बार मिले थे..अभी तक वही आखिरी है पर मुझे उम्मीद है शायद इस छोटी सी दुनिया मे फिर कभी मिलना हो जाए... हाँ वैसा मिलना नही हो पाएगा पर एक दूसरे को देखना भी तो किसी मिलन से कम नही है...

पर मुझे ज्यादा प्यारी है वो वादों वाली अलमारी, क्योंकि वो बड़ी हल्की है उसे मैं अपने साथ कहीं भी ले जा सकता हूँ...कुछ ख़ास है नही उसमें फिर भी मुझे वही पसंद है..उसमें सिर्फ़ मैंने वो आख़िरी मुलाक़ात वाला वादा रखा है...वो वादा जो हमनें एक दूसरे से किया था..कभी एक दूसरे को ना भूलने वाला वादा..एक दूसरे से दूर रहकर भी ख़ुश रहने का वादा..क्योंकि इस वादे से पूरा होता है अपना वो सपना जो हमने देखा था...

अरे वही अपने प्रेम को जिंदा रखने का सपना...देखो ना  दोनों एक दूसरे को नही भूले और इस तरह अपना प्रेम हो गया ना अमर प्रेम....

बस यही है मेरी धरोहर...

Monday, 23 July 2018

मौन भला हूँ

मैं  गुलों के  जैसा महकता  नही हूँ
सितारा हूँ लेकिन चमकता नही हूँ
ज़माना ये समझे कि खोटा हूँ सिक्का
बाज़ारों  में  इनकी  मैं  चलता नही हूँ
यूँ  तो अंधेरों  से  जिगरी  है  यारी
मैं ऐसा हूँ सूरज की ढलता नही हूँ
सफ़र पे जो निकला तो मंज़िल ज़रूरी
यूँ  राहों  में   ऐसे  मैं   रुकता  नही  हूँ
उम्मीद-ए-वफ़ा  ने है तोड़ा  मुझे भी
मैं आशिक़ के जैसा तड़पता नही हूँ
कोशिश में ज़ालिम की कमी नही थी
मैं पहले ही राख  हूँ  जलता  नही  हूँ
मयखानों की रौनक है शायद मुझी से
मैं  कितना  भी पी लूँ  बहकता नही हूँ
सूरत  से  ज्यादा  मैं  सीरत  को चाहूँ
रुख़सारों पे चिकने फिसलता नही हूँ
मुसीबत से अक़्सर कुश्ती हूँ करता
है लोहा  बदन मेरा  थकता  नही हूँ
मिट्टी का बना हूँ जमीं से जुड़ा हूँ
खुले आसमानों में उड़ता  नही हूँ
हुनर पार करने का सीखा है मैंने
बीच भँवर अब मैं फंसता नही हूँ
'मौन'  भला  हूँ  ना  छेड़ो  मुझे  तुम
मैं यूँ ही किसी के मुँह लगता नही हूँ


घर से निकले हैं पढ़ने को....

घर  से  निकले  हैं  पढ़ने  को जीवन  के पथ  पर  बढ़ने को कदम  है अगला आज बढ़ाया एक रोज शिखर पर चढ़ने को ना  पहले  सी शामें  होंगी ना  सुबहा ...