Tuesday, 26 February 2019

जीने की वज़ह दे दो

टूटे  इस  रिश्ते  में, आ  कर के  गिरह  दे दो
शिकवों को संग लाओ, लंबी सी जिरह दे दो

अश्कों  से  भरी आँखें, ग़मगीन  सी  हैं  रातें
शामों में हो शामिल, मुझे अपनी सुबह दे दो

तन्हाई   के  आलम   में,  मीलों   मायूसी  है
जीवन में आ जाओ, इस ग़म को विरह दे दो

अपने इस दिल मे तुम, थोड़ी सी जगह दे दो
साँसों  में  समा  जाओ, जीने की वजह दे दो

अमित 'मौन'

Sunday, 24 February 2019

मैं तुझसे लड़ने आया ग़म

रब से कोई दुआ थी माँगी
फल में जिसके  पाया ग़म

सबके हिस्से आई खुशियाँ
मेरे   हिस्से   आया   ग़म

भोर दोपहर या हो संध्या
बदली बन के  छाया ग़म

भारी सा दिल गीली आँखें
मुझको बहुत  रुलाया ग़म
 
क्या चाहे तू क्या है इच्छा
क्यों तूने मुझे सताया ग़म
 
एक  ज़िंदगी, चंद  हैं  साँसें
क्यों कर दूँ इसको ज़ाया ग़म

सुन, मैं पत्थर  हो  जाऊंगा
ग़र अपनी पे जो आया ग़म
 
जोश मिलाया जब हिम्मत संग
डरा   बहुत   घबराया   ग़म

धमकी दी मुझको क़िस्मत की
फ़िर  और  मुश्किलें लाया ग़म

मज़बूत इरादे,संग इच्छाशक्ति
मैं  तुझसे  लड़ने  आया  ग़म

क़ोशिश कर ली ज़ोर लगाया
कुछ  भी  ना कर  पाया  ग़म

हार मानकर वापस भागा
ग़लती  पे  पछताया  ग़म

तूने  सोचा ना  हो पाएगा
करके मैनें दिखलाया ग़म

अमित 'मौन'
  

Friday, 22 February 2019

यादें...

यादें....

याद है तुम्हें जब थोड़ी सी बारिश में भी मैं बहुत ज्यादा भीग जाया करता था..क्योंकि मैं जानता था घर पहुँचने पर तुम डाँटोगी मुझे और सलाह दोगी की बारिश में कहीं रुक कर इसके थमने का इंतज़ार करना था....

पर क्यों करता मैं इसके रुकने का इंतज़ार जब मुझे पता है कि तुम मेरे पहुँचते ही अपने प्यार की बारिश में मुझे सराबोर कर दोगी...इन गीले कपड़ो के उतरने से पहले तौलिया मेरे सामने होगा...कमरे तक पहुँचने से पहले चाय का कप थामे तुम खड़ी होगी और बिस्तर तक जाने से पहले गर्म सरसों के तेल की कटोरी में डूबी हुई तुम्हारी रुई सी उंगलियाँ मेरे तलवों को स्पर्श कर रही होंगी..

अब तुम ही बताओ कैसे वो बारिश मुझे रोक पाती?
 
खैर...आज फ़िर बारिश हो रही है और मैं इसके रुकने का इंतज़ार कर रहा हूँ......

अमित 'मौन'

Wednesday, 20 February 2019

मैं प्रेम में डूबी स्त्री हूँ


अथाह प्रेम की गहराइयों में उतर
सहनशीलता के चरम को पा लेती हूँ
मैं  प्रेम  में  डूबी  स्त्री  हूँ
मैं सब कुछ छुपा लेती हूँ

लहरों सी उमड़ती भावनाएँ
बंद  आँखों में दबा लेती हूँ
नदियों सा वेग लिए अश्रुओं को
रुई समान गालों में सुखा लेती हूँ

मैं प्रेम में डूबी स्त्री हूँ, मैं सब कुछ छुपा लेती हूँ

मिलन के अनमोल पलों को
मन मस्तिष्क में बसा लेती हूँ
विरह  की  अँधियारी  रातों  में
यादों की बारिश में नहा लेती हूँ

मैं प्रेम में डूबी स्त्री हूँ, मैं सब कुछ छुपा लेती हूँ

तानों  के  तीर  हों  तीखे  ही  सही
आह अपनी ख़ुद को ही सुना लेती हूँ
बचाती हर आँच से प्रेम अपना
मैं ख़ुद  को  ही  जला लेती  हूँ

मैं प्रेम में डूबी स्त्री हूँ, मैं सब कुछ छुपा लेती हूँ...

अमित 'मौन'

Monday, 18 February 2019

हो बात अगर बस ख्याति की

हो बात अगर बस ख्याति की
मैं  ख़ुद  ही  पीछे  हो  जाऊं
विख्यात बनो तुम अमर रहो
मैं इतिहास बनूँ और खो जाऊं

तुम बनो देवता मंथन में
मैं नाग वासुकी हो जाऊं
हो  अमृत  तेरे  हिस्से में
मैं कालकूट सा विष पाऊं

तुम  त्रेता  के  रावण  होना
मैं  कुम्भकर्ण  ही  हो जाऊं
तुम बड़े बनो और आज्ञा दो
मैं  प्राण  पखेरू  ले  आऊं

तुम द्वापर के अर्जुन होना
मैं  एकलव्य  ही  हो जाऊं
तुम बनो धनुर्धर इस युग के
हँस  के  अँगूठा  ले  आऊं
 
तुम राम रहो या कृष्ण बनो
मैं  शेषनाग  सा  हो  पाऊं
हो नाम तुम्हारा हर युग में
मैं साथ निभाने आ जाऊं

अमित 'मौन'

शब्दों की माला

मैं  चाहूँ  तुझे  ही, ये  कैसे  बताऊँ जो पढ़ के ना समझे तो कैसे जताऊँ देखूँ तुझे तो मैं, ख़ुद ही को भूलूँ यूँ  चेहरे से नज़रें  मैं कैसे हटा...