Friday, 26 January 2018

Har subah naye sapne- हर सुबह नये सपने

हर सुबह एक अलग नये सपने सजाता हूँ
शाम तलक उन्हें मैं खुद ही भूल जाता हूँ

ख्वाहिशें हज़ार ले कर रोज़ कमाने जाता हूँ
बेच के ईमान खाली जेबें नही भर पाता हूँ

है मेरा भी कोई अपना ये सब को बताता हूँ
पर हूँ सच में अकेला ये सबसे छुपाता हूँ

मिलेगा मौका हंसने का सोच के गम भुलाता हूँ
मुठ्ठी भर खुशियों को मैं फिर भी तरस जाता हूँ

हर दर पे हूँ भटकता तलाश तो पूरी हूँ करता
पर ढूंढ़ने क्या निकला ये समझ नही पाता हूँ

दिया जीवन खुदा ने तो कुछ मकसद होगा
ये सोच के यारों मैं मर भी नही पाता हूँ

बस थोड़ी है राहें अब जल्द मिलेगी मंजिल
ये सोच कर 'मौन' बस बढ़ता चला जाता हूँ

Thursday, 25 January 2018

Yahin se niklega- यहीं से निकलेगा

माना की दिल है मोम सा पर यूँ ही नही पिघलेगा
तपिश बोसा-ए-यार की मिले तो पल में पिघलेगा

इल्म है की पत्थर सा नज़र आता है जिस्म मेरा
एक चोट तो मार के देख खून यहीं से निकलेगा

रात काली है अमावस की तो गम क्या करना
थोड़ा इंतज़ार तो करो चाँद यहीं से निकलेगा

किस्से आशिक़ी के हमारे यूँ तो मशहूर कभी ना हुए
पर जिक्र हमारा हुआ तो अफ़साना यहीं से निकलेगा

कुछ बात ऐसी की कूचा-ए-यार में आना ना हुआ
पर बाद मरने के जनाज़ा 'मौन' का यहीं से निकलेगा

Wednesday, 24 January 2018

Aise wale log- ऐसे वाले लोग

गंभीर हालात में विशेष टिप्पणी देने आते हैं
कोई भी हो मुद्दा महाशय सबकी जानकारी बढ़ाते हैं
आपकी सुनते नही और खुद को सलाहकार बताते हैं
जरा सा भाव दिया इन्हें तो मक्खी सा चिपक जाते हैं
इन्हें लगता है शायद ये हमारी समस्या सुलझाते हैं

खुद को हो दिक्कत जरा सी तो पागल हो जाते हैं
मुश्किलों के भंवर में तिनकों से उड़ जाते हैं
अंदर से हैं खोखले पर ये शोर ज्यादा मचाते हैं
बिखरे हैं टुकड़ो में खुद को समेट नही पाते है
ये वही लोग हैं जो हमे जीने का सलीका सिखाते हैं

Sunday, 21 January 2018

Gubbare wala ladka - गुब्बारे वाला लड़का

उस मासूम के होंठ काँप रहे थे
पर गुब्बारे फुलाने को वो बेकरार था

शायद वो खुद भी ये भूल गया था
आज सुबह से उसको तेज़ बुखार था

मैं तो मस्ती में यूँ ही घूम रहा था
आज छुट्टी है अपनी दिन इतवार था

उसे फ़िक्र थी शाम की रोटी की शायद
इस लिये उसपे कमाने का भूत सवार था

Monday, 15 January 2018

Kuch is tarah humne jindagi ko jiya hai

देखे हैं हमने भी कई रंग दुनिया के
बदलते तौर तरीके और ढंग दुनिया के
इस इंद्रधनुष में शामिल खुद को किया है
कुछ इस तरह हमने जिंदगी को जिया है

टूटे ख़्वाब बिखरे अरमान कई बार
रुके कदम हुई थकान कई बार
अपने ज़ख्मों को फिर हौसलों से सिया है
कुछ इस तरह हमने जिंदगी को जिया है

किये जो जुर्म नही उनकी भी सजा पायी है
ये जिंदगी रोने के कई बहाने लायी है
आंसुओं के झरनों को कई बार पिया है
कुछ इस तरह हमने जिंदगी को जिया है

बीते हसीन लम्हे भी जिनमे अपने थे पास
थी खुशियां हजार और खूबसूरत एहसास
हूँ शुक्रगुजार खुदा का जो ये जीवन दिया है
कुछ इस तरह हमने जिंदगी को जिया है

Wednesday, 10 January 2018

Sab yun hi chalte rhne do

दीदार-ऐ-नजर ना सही सपनों में आते रहिये
मुलाकातों का सिलसिला यूँ ही चलते रहने दो

लब खामोश अगर तो क्या आँखों से बताते रहिये
इस दिल को अपनी बेकरारी यूँ ही कहते रहने दो

हवा आहिस्ता बहे तो क्या इन जुल्फों को उड़ाते रहिये
इन केशों को हंसी चेहरे पे यूँ ही बिखरते रहने दो

लाख गम हो सीने में मगर फिर भी मुस्कुराते रहिये
इन हंसी के फुहारों को यूँ ही निकलते रहने दो

जल्द होगी मुलाक़ात उनसे खुद को समझाते रहिये
तुम 'मौन' सही पर अरमानों को यूँ ही मचलते रहने दो

Tuesday, 9 January 2018

Ab jara kuch waqt gujaar ke dekh insaan bankar

इतना वक़्त गुजार दिया तूने हिन्दू और मुसलमान बनकर
अब जरा कुछ वक़्त गुजार के देख सिर्फ इंसान बनकर

कभी प्रार्थना मंदिर में की कभी दुआ की मस्जिद जाकर
कभी माँगा व्रत रख के कभी दुआ की रोज़ा रखकर
कुछ गीता का ज्ञान लिया कुछ तरीका कुरान पढ़कर
अब जरा कुछ वक़्त गुजार के देख सिर्फ इंसान बनकर

क्यों ना सीख पाया इंसानियत विद्यालय और मदरसे जाकर
कभी घूमे भगवा पहन के कभी हरे रंग में लिपटकर
ऊपर वाला भी है कहता कभी भगवान् कभी अल्लाह बनकर
अब जरा कुछ वक़्त गुजार के देख सिर्फ इंसान बनकर

कभी राज किया राजा बनके कभी शासन सुलतान बनकर
या तो जल के राख होगा या चला जायेगा शमशान मरकर
कोई फर्क नही देश और मुल्क में रहने दे इसे हिंदुस्तान बनकर
अब जरा कुछ वक़्त गुजार के देख सिर्फ इंसान बनकर

क्यों पाले नफरत दिलों में क्यों जीये यूँ घुट घुट कर
अब जरा कुछ वक़्त गुजार के देख सिर्फ इंसान बनकर

Monday, 8 January 2018

Ye sard hawa aur tum

ये सर्द हवायें भी आज जाने क्यों लग रही हैं तुम्हारी तरह

ये छूती हैं मुझे तो एक सिहरन सी होती है तुम्हारी तरह

ये कानों में मीठा सा शोर मचाती हैं तुम्हारी तरह

ये करीब आ जायें तो सांसें रुक जाती है तुम्हारी तरह

ये मेरे होठों को सुर्ख कर जाती हैं तुम्हारी तरह

ये सीने से लग जायें तो धड़कनें बढ़ाती तुम्हारी तरह

ये भीतर कहीं घुस के गुदगुदाती हैं तुम्हारी तरह

ये मुझे मदहोश कर जाती हैं तुम्हारी तरह

ये बिना बताये कभी कभी आती है तुम्हारी तरह

ये जब भी आये अपना असर छोड़ जाती है तुम्हारी तरह

हाँ ये भी है बिल्कुल तुम्हारी तरह एकदम तुम्हारी तरह

Friday, 5 January 2018

Chand paise kamaane ko gaanv se sahar aya

चंद पैसे कमाने को गाँव से शहर आया
मिलती है शहर में खुशियां लोगों ने बताया


देखा उनकी नज़र से तो उम्मीद का सूरज नजर आया
पहली बार गाँव से निकलने को अपना कदम बढ़ाया

छोड़ के वो पुरानी यादें और वो पुराना घर आया
वो टूटी सड़कें और पेड़ो की छाँव न भूल पाया

तय करके मीलों का सफर इस शहर में आया
हर तरफ ऊँची इमारतें और गाड़ियों का शोर पाया

मिले कुछ तजुर्बे ऐसे तब जाके ये समझ आया
सपने बुने थे कुछ और हकीकत में कुछ और पाया

चंद पैसों की खातिर यहाँ अपना ईमान गंवाया
पाने को कुछ खुशियां इच्छाओं को दांव पे लगाया

जो निकला हूँ गाँव से एक बार वापस नही जा पाया
उम्मीद थी उजाले की पर हर तरफ अँधेरा नजर आया

यादों की जंजीरें तोड़ के हर रोज नया सपना सजाया
टूटे सपने हर बार मगर खुद ही खुद को समझाया

सफर मीलों का तय किया पर मंजिल तक न पहुँच पाया
अगर सफर ही है मंजिल तो क्यों इतनी दूर निकल आया

आज पैसे तो हैं जेब में पर वो सुकून नही मिल पाया
क्या यही वो शहर है जिसकी खातिर मैं गाँव छोड़ आया

Tuesday, 2 January 2018

Lautkar phir nhi atey kabhi jaane wale

लाख आवाज लगाते रहें बुलाने वाले

लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

एक अरसा गुजर गया इंतज़ार में उनके
खुद को बिसराया था प्यार में जिनके
अब वही रुलाते हैं जो थे कभी हँसाने वाले
लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

सुबह शाम गुजरती थी बाँहों में जिनकी
अब तो बस यादें रहती हैं पास उनकी
जाने कहाँ गये दो दिलों को मिलाने वाले
लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

खिलती थी नाम से जिनके दिल की हर कली
जिनके आने से हमको हर ख़ुशी थी मिली
जाने कहाँ गए मोहब्बत की लौ जलाने वाले
लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

सारी उम्र साथ रहने का वादा था किया
कुछ दिनों का साथ फिर मुंह मोड़ लिया
तोड़ देते है सपने वही जो थे दिखाने वाले
लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

लाख आवाज़ लगाते रहें बुलाने वाले
लौटकर फिर नहीं आते कभी जाने वाले

Monday, 1 January 2018

Har wo baat likhte hain

कुछ अपनी दास्तान कुछ अनकहे जज्बात लिखते हैं
हम अपनी शायरी में हर वो बात लिखते हैं

कुछ हसीन लम्हे कुछ अधूरी मुलाकात लिखते है
हम अपनी शायरी में हर वो बात लिखते हैं

कुछ दिन सुकून के कुछ दर्द भरी रात लिखते है
हम अपनी शायरी में हर वो बात लिखते हैं

कुछ बदमाशियां उनकी कुछ अपनी खुराफात लिखते हैं
हम अपनी शायरी में हर वो बात लिखते हैं

कुछ दूरियां दरमियां पर हर पल उनके साथ लिखते हैं
हम अपनी शायरी में हर वो बात लिखते हैं

इतवार...एक लघु कथा

आज फिर इतवार है... वही इतवार जिसका छोटू और बबली बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करते हैं...करें भी क्यों ना? इतवार के दिन उन्हें जलेबी जो खाने को मिल...