Thursday, 14 May 2020

है इश्क़ अग़र

है इश्क़ अगर तो जताना ही होगा
दिलबर को पहले बताना ही होगा

पसंद नापसंद की है परवाह कैसी
तोहफ़े को पहले छुपाना ही होगा

धड़कन हृदय की सुनाने की ख़ातिर
उसको गले तो लगाना ही होगा

आँखों ही आँखों में जब हों इशारे
ओ पगली लटों को हटाना ही होगा

छूकर तुम्हें अब है महसूस करना
होठों को माथे लगाना ही होगा

ख़्वाबों को रस्ता देने की ख़ातिर
नींदों को रातों में आना ही होगा

मज़ा बेक़रारी का लेना अगर हो
मिलन के पलों को घटाना ही होगा

अमित 'मौन'

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8 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(१६-०५-२०२०) को 'विडंबना' (चर्चा अंक-३७०३) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

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  2. बहुत बढ़िया

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  3. वाह!!!
    बहुत लाजवाब।

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