Saturday, 17 January 2026

प्रेम लौटता है

 प्रेम

कभी सामने से नहीं आता

वह आता है

बिना दस्तक

बिना आहट


जैसे नींद

थकी हुई आँखों में

ख़ुद ही उतर आती है


कभी वह छुपा होता है

मोबाइल की गैलरी में

किसी धुंधली तस्वीर के कोने में


या फिर

पुरानी चैट के बीच

जहाँ आख़िरी संदेश

अब भी “ख़याल रखना” है


प्रेम लौटता है

और आ बैठता है

कुर्सी खिसकाने की आवाज़ पर

या बालों में उँगलियाँ फिराते वक़्त

जब हाथ

अपने आप रुक जाता है


कभी-कभी

वह बन जाता है

एक अधूरा वाक्य

जो बोलते-बोलते

होंठों पर ही रह जाता है


या कोई सवाल

जिसका जवाब

अब ज़रूरी नहीं लगता


प्रेम

किसी पुराने स्वेटर की तरह है

जो अब पहना नहीं जाता

पर फेंका भी नहीं जाता

ठंड अचानक बढ़ जाए

तो वही

सबसे पहले याद आता है


और यूँ

बिना कहे

बिना लौटने का वादा किए


प्रेम

फिर से

मौजूद हो जाता है


अमित ‘मौन’

P.C.: GOOGLE


Friday, 8 September 2023

अधूरी कविता

इतना कुछ कह कर भी बहुत कुछ है जो बचा रह जाता है

क्या है जिसको कहकर लगे बस यही था जो कहना था

झगड़े करता हूँ पर शिकायतें बची रह जाती हैं

और कविता है कि हर पंक्ति के बाद अधूरी लगती है


दुनिया ईर्ष्या में सम्मोहित होकर दानव हो गई

पर तुमने हृदय को लक्ष्मण रेखा में सुरक्षित रखा

इन दो आँखों से कोई कितना देख पाता

तुमने क्या देखा कि आँखें बंद कर ली


कुछ खोजना मतलब कुछ खो जाने की चिंता करना है

मैं तुम में खुशियाँ ढूंढ़ता रहा और तुम ख़ुशियों में मुझे

फ़िर ना ही तुम मिली और ना ही ख़ुशियाँ


मेरा जीवन एक कैनवस था

और तुम्हारे हाथों में रंगों की बाल्टियाँ

मुझे प्रेम में फूल होना था

और तुम्हें तितलियों का जीवन जीना था


मेरा वो हर सपना अजीज था जिसमें तुम थी

पर हर नींद को एक सुबह से मिलना था 

अब तुमने जो बताया उससे जीवन जीता हूँ

और तुमने जो सिखाया उससे कविता लिखता हूँ


अब जीवन एक कविता है और कविता में पूरा जीवन...


अमित 'मौन'


PC : Google


Sunday, 9 July 2023

आख़िरी बार

हम मिले और मुस्कुराए
ये जानते हुए भी ये आख़िरी बार है
सूखे होंठों पर मुस्कान उकेरते हुए
कितनी सहजता से गले लगकर
ख़ुश रहने की दुआएं निकाली गयी

हमने ये तय कर लिया था कि
कंधों को आँसुओं का बोझ नही देंगे
क्योंकि छाती का भार काँधे पर रखकर 
जीवन की गाड़ी नही चलाई जाती

कितना आसान हो जाता है 
अपनी आत्मा को मारना
जब समय साथ ना हो
और कितना मुश्किल होता है
गालों को सुखा रखना
जब खामोशियाँ फूटने को हों

कुछ अंत सुखद नही होते
पर उन्हें दुःख का नाम नही दिया जाता
कुछ बातें अक्सर अधूरी रहती हैं
और उन बातों को भुलाया नही जाता ।

अमित 'मौन'

PC : Google

Saturday, 1 April 2023

जमापूँजी

 लम्हों की लड़ी है ये जीवन

और तुम यादों का अनोखा संसार 

कुछ तो अलग है तुम्हारी छुअन में

जो लहू को ताजा कर जाता है


कोई दूसरी दुनिया है तुम्हारा साथ

जहाँ हँसने से उजाला होता है

तुम्हारे होने भर से समय रुक जाता है

घड़ियों की चाल बदल सकती हो तुम


जादू कोई कला नहीं एक सोच भर है

मुझे हँसा कर करिश्मों में यकीन बढ़ाती हो

उदासियाँ  श्राप  से  मिलती  होंगी

और आशीर्वाद  का  फल  हो  तुम


हवाएं मुट्ठी में भर कर साँसें बांटती हो

ईश्वर की  भेजी एक चिट्ठी हो तुम

पहचान छुपाता बहुरूपिया हूँ मैं

और जीवन की जमापूँजी बस तुम


अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Friday, 17 March 2023

जीवन


क्या हो जो जीवन किसी पटरी पर चले

क्यों ना सुख दुःख निर्धारित मात्रा में मिले


संघर्ष इतना कि साहस जवाब ना दे

और आराम इतना कि शरीर बोझ ना बने


ज्ञान इतना कि सही गलत में फ़र्क लगे

अज्ञानता इतनी की जीवों में समानता दिखे


मुस्कान ऐसी की मन में कटुता ना रहे

और आँसू ऐसे की आँखों से निश्छलता बहे


सुख इतना कि मन में बस भक्ति जगे

और दुःख इतना कि जीवन श्राप ना लगे।


अमित 'मौन'

P.C.: GOOGLE



Monday, 26 December 2022

अलग दुनिया

तुम थी तो सब कितना आसान लगता था। ये दुनिया तुम्हारे इर्द गिर्द सिमटी हुई थी। समंदर की लहरें तुम्हारी आँखों में हिचकोले मारती और पुतली बने आसमान को भिगोया करती थी। केशों में हवाएं कैद करके तुम उंगलियों से तूफान की दिशा तय करती थी। बारिशें तुम्हारी मुस्कुराहट से मिलने आया करती थीं और पेड़ तुम्हारे लिए हरियाली का तोहफ़ा लाया करते थे। हर रास्ता तुमसे होकर गुजरता और हर सफ़र की मंज़िल तुम थी। मैं अनंत संभावनाओं के उस शिखर पर था जहाँ सब कुछ बस पलकें झपकाने जितना आसान था।


पर अब लगता है मैं किसी और दुनिया में हूँ और ये दुनिया इतनी बड़ी है कि हर रोज जाने कितने लोग एक दूसरे से बिछड़ जाते हैं और फ़िर कभी नही मिल पाते। ख़ुशियों ने रूठकर ख़ुदकुशी कर ली है और पानी बादलों को छोड़कर मेरी आँखों मे बसता है। मैं अनहोनी की आशंकाओं से घिरा हुआ हूँ और वो एक मुमकिन रास्ता ढूँढ़ रहा हूँ जिसकी मंज़िल तुम हो।

मैं दो दुनियाओं के बीच फँसकर सपने और हकीक़त के बीच का फर्क तलाश रहा हूँ और तुम शायद कहीं दूर मेरे इंतज़ार में जीवन के फूलों को मुरझाते हुए देख रही हो।

अमित 'मौन'

P.C.: GOOGLE


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