Thursday, 21 December 2017

हे वीर धरा के उठो आज, hey veer dharaa ke utho aj

हे वीर धरा के उठो आज
कर्त्तव्य के पथ पे बढ़ो आज
फैली बुराइयां है चहुँ ओर
उन सबसे मिलके लड़ो आज

ये मातृभूमि है वीरों की
ये पुण्य धरा है धीरों की
गाथाएं लिखी हैं साहस की
अपने इतिहास को पढ़ो आज

ये माटी अब तुझे बुलाती है
बलिदानों की याद दिलाती है
अब वक़्त है क़र्ज़ चुकाने का
अपनी क्षमताओं से मिलो आज

किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा हुआ
किस दुविधा में है पड़ा हुआ
अब भूल के बंधन जात पात का
मिलाके कदम साथ तुम चलो आज

हे वीर धरा के उठो आज, कर्त्तव्य के पथ पे बढ़ो आज

No comments:

Post a Comment

मनुष्य

अगर मुझे मनुष्य होना सीखना हो तो मैं तुम्हारे मौन से शुरू करूँगा जहाँ करुणा किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती। अगर मुझे कोई प्रश्न सताने लगे त...