Sunday, 11 February 2018

मोहब्बत का शुरू सफर ना हुआ- mohabbat ka shuru safar na hua

मोहब्बत का शुरू सफर ना हुआ
वो कभी मेरा हमसफ़र ना हुआ
क्यों करें शिक़वे उसकी बेवफाई के
जब दिल में उसके मेरा बसर ना हुआ
कुछ यूँ रहा अपना अंजाम-ए-मोहब्बत
जो पहले कभी किसी का हसर ना हुआ
हर दफ़ा हाज़िर रहे उनके इशारे पे
पर वो कभी हमे मयस्सर ना हुआ
बस ग़ुम रहा इन अंधेरों में इश्क मेरा
एक शब ऐसी जिसका सहर ना हुआ
शायद इसलिये हो गया हूँ 'मौन' अब
मगरूर पे जज्बातों का असर ना हुआ

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