Sunday, 18 February 2018

दर्द से रिश्ता- dard se rishta

दर्द से अपना रिश्ता बड़ा पुराना है
जाके लौट आयेगा ये मेरा दीवाना है

सहर होते ही परिंदे उड़ गये थे जो
शब में उन्हें शज़र पे लौट आना है
 
ये धूप जो निकली है मेरी छत पे
कुछ देर में आफताब डूब जाना है
 
सहम जाता हूँ तूफ़ान के नाम से
सूखी लकड़ी का मेरा आशियाना है

रेत पे क़दमों के निशान जैसा मैं
सैलाब आते ही इन्हें मिट जाना है

नज़रंदाज़ कर दो मेरी इन आहों को
बस कुछ चीखें और 'मौन' हो जाना है

No comments:

Post a Comment

आख़िरी तर्क: प्रेम

उपन्यास-   आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...