Monday, 2 July 2018

गिला नही करते...

ख़ज़ान  के  दिनों  में  धूप  सहा नही करते
उस बूढ़े शज़र पे अब परिंदे रहा नही करते
बेटे बड़े होकर  अब ख़ुद में मशगूल  रहते  हैं
हक़ वालिद की परवरिश का अदा नही करते
अम्मी  भी   जाने  क्यों   आस  लगाये  रखती  है
क्या कुछ लोग बिन औलादों के जिया नही करते
जख़्मों  के  नासूर  बनने  का इंतज़ार करते हैं
बड़े अजीब लोग हैं जो इसकी दवा नही करते
ख़ुदा  ख़्यालों  में भी  यही सोचता  होगा
अब इंसान लंबी उम्र की दुआ नही करते
रिश्तों  में  दीवारें  अब  लंबी  हो  गई हैं
इन ऊँचे घरों में झरोखे हुआ नही करते
रिवायतें  जमाने  की  अब  बदल  गयी हैं  'मौन'
ख़ुद में कर तब्दीलियाँ औरों से गिला नही करते

8 comments:

  1. बहुत ख़ूब ..।
    कुछ लाजवाब शेर ... बहुत उमदा ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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  2. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २१०० वीं बुलेटिन अपने ही अलग अंदाज़ में ... तो पढ़ना न भूलें ...



    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, कुछ इधर की - कुछ उधर की : 2100 वीं ब्लॉग-बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. इससे खूबसूरत भी क्या लाजवाब शेर ... बहुत उमदा ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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