Wednesday, 7 October 2020

शब्दविहीन

एक बात के कई मतलब निकालने वाली इस दुनिया ने कई बार उन शब्दों के भी मतलब निकालने चाहे जिनका अर्थ समझाने के लिए शब्द बन ही नही सके। कई बार हम समझ ही नही पाते कि कुछ अर्थों को शब्दों से नही भावनाओं से समझा जाता है।

हम बहुत ख़ुश होते हैं तो ख़ुशी बयान नही कर पाते और दुःखी होते हैं पर दुःख व्यक्त नही कर सकते।

ख़ुशी क्या होती है ये अपने पहले बच्चे को गोद में लेने के बाद पता चलता है और दुःख क्या होता है ये उस स्त्री से बेहतर कौन जान सकता है जिसने मंगलसूत्र पहनने का सौभाग्य खो दिया हो।

निराशा किसे कहते हैं ये उस किसान को मालूम है जिसको महीनों की मेहनत के बाद भी लहलहाती फ़सल देखना नसीब नही हुआ और चिंता भला उस पिता से बेहतर कौन जानेगा जिसकी बेटी की उम्र समाज के हिसाब से हाथ पीले करने की हो गयी हो।

गर्व करने के लिए आपको उस सिपाही का पिता बनना पड़ेगा जिसके बेटे को देश की सेवा के लिए एक विशेष समारोह में सम्मान मिल रहा हो और शर्मिंदगी का अनुभव एक अपराधी का परिवार जानता है।

दया भाव को वही महसूस कर सका है जिसने दर्द से कराह रहे किसी बेजुबान जानवर को सड़क से उठा कर उसका इलाज किया हो और समर्पण को वही समझ सका जिसने किसी के कंधे पर सर रखकर आँखें मूंद ली हों।

तुमसे मिलकर मैंने जाना कि पाने की ख़ुशी क्या होती है और तुम्हारे जाते ही मैंने खोने की पीड़ा को समझा।

हम ज़िंदगी को जितना करीब से जानने की कोशिश करते हैं उतना ही ख़ुद को शब्दविहीन पाते हैं। हम देखी-सुनी बातों को भले ही कविता या कहानी में ढालने में सक्षम हों पर अनुभवों को लिखने के लिए हमें कभी भी सटीक शब्द नही मिल पाते। हम कितना भी लिख लें पर आख़िरी पंक्ति के बाद भी बहुत कुछ छूट गया लगता है।

कुछ बातें अपने कहे जाने के इंतज़ार में दम तोड़ देती हैं।

अमित 'मौन'


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