Wednesday, 3 February 2021

संभावना

 मेरी उदास कविताओं को

जीवंत बना देती हो तुम
पढ़ने के अनोखे अंदाज से

जीने की मृत इच्छा को
पल भर में बदल देती हो
कंधे पर हाथ भर रख कर

किसी नास्तिक को भी
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ा दो
ईश्वर की भेजी एक दूत हो तुम

और मैं ख़ुद के होने की वजह ढूँढ़ता
लौह पुरुष होने का ढोंग रचता हुआ
हार जाता हूँ तुम्हारी चुम्बकीय शक्ति से

गुरुत्वाकर्षण का मुख्य केंद्र हो तुम
जो खींच लेती हो मेरी हर निराशा को
कितना कुछ है तुम्हारी बातों की पोटली में
जो हर बार जीने का कारण ढूँढ़ लाती हो

सर्द रातों में गिरी ओस की आख़िरी बूँद हूँ मैं
और मेरा भार उठाए मुलायम हरी दूब हो तुम
तुम्हारे छोड़ने भर तक बचा है अस्तित्व मेरा

दुःखों से भरा, हारा हुआ पितामह हूँ मैं
मृत्यु शैया पर लेटा
सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में
और तुम हो जो आमादा हो
पृथ्वी का अगला चक्कर रोकने पर

दुनिया में असंभव कुछ भी नही
बस इसी संभावना का संचार कर
बचा लेती हो मुझे हर बार, कितनी बार।

अमित 'मौन'

P.C.: GOOGLE


14 comments:

  1. दुःखों से भरा, हारा हुआ पितामह हूँ मैं
    मृत्यु शैया पर लेटा
    सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में
    और तुम हो जो आमादा हो
    पृथ्वी का अगला चक्कर रोकने पर

    महाभारत महाकाव्य के चरित्र के माध्यम से बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति...
    साधुवाद !

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. गुरुत्वाकर्षण का मुख्य केंद्र हो तुम
    जो खींच लेती हो मेरी हर निराशा को
    कितना कुछ है तुम्हारी बातों की पोटली में
    जो हर बार जीने का कारण ढूँढ़ लाती हो


    उम्दा रचना माननीय बधाई व शुभकामनाएँ ।
    सादर।

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ५ जनवरी २०२१ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  5. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  6. वाह ! अटूट विश्वास की कथा कहती बहुत सुंदर रचना।

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    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  7. बहुत खूबसूरत रचना

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