Welcome to my Blog. I write what i saw & learn from life. Because: जो पढ़ा किताबों में, अमल में लाऊं भी तो क्या, ये जिंदगी है जनाब, फलसफ़ों से नही चलती.... Suggestions/appreciations in comment box are always welcomed. You can also read my latest writing at the following link: www.yourquote.in/amitmaun
Wednesday, 28 April 2021
इच्छाशक्ति जगाए रखना
Wednesday, 31 March 2021
रश्क़
रोज इसी वक़्त छत पर आओगी
तो पड़ोसी कानाफ़ूसी करेंगेपकड़ी तुम जाओगी
और शामत मेरी आएगी
बिन बात मुस्कुराती हो
बेवज़ह चौंक जाती हो
जो किसी को भी शक हुआ
अपनी जासूसी हो जाएगी
अब आ ही गयी हो
तो बालों को खुला छोड़ो
चूम के ऊँगली उछाली है मैंने
गालों से ज़ुल्फें हवा उड़ाएगी
रोज रोज चुनर लहराओगी
तो बादलों को तकलीफ़ होगी
वो गुस्से में बड़बड़ाएंगे
और बारिश हो जाएगी
इन बालियों को कहो
इतना भी ना चमकें
कहीं सूरज जल गया अगर
मोहल्ले में रोशनी ना आएगी
यूँ जोर जोर गुनगुनाओगी
तो कोयल को रश्क़ होगा
वो बिगड़ी तो महीनों तक
फ़िर प्रेम गीत ना सुनाएगी
सोचो किसी शाम ऐसा भी हो
तुम आओ और मैं ना मिलूँ
बमुश्किल रात कटेगी तुम्हारी
बेचैनी रहेगी, नींद नही आएगी
मैंने तो लिख दी है कविता
अब तुम भी एक चिट्ठी लिखो
कब तक तुम्हारे दिल का हाल
मुझसे तुम्हारी सहेली बताएगी।
अमित 'मौन'
Tuesday, 2 March 2021
परफ्यूम
'मैं तो यही चाहूँगी कि हम बीच बीच में मिलते रहें, बाकी तुम्हारी मर्जी' ये उसकी आख़िरी लाइन थी जो मेरे कानों ने सुनी थी। उसके बाद हम कभी नही मिले।
एक आम आशिक़ की तरह मैंने भी कई बार उससे कहा था कि तुम आँखों से जादू टोना करती हो क्योंकि मैं जब भी इन्हें देखता हूँ बस खो जाता हूँ। सच बताऊँ तो उसकी आँखों को मैंने इतनी शिद्दत से देखा है कि उनका जादू मेरी आँखों में उतर आया है। मैं जब भी अपनी आँखें बंद करता हूँ तो उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। कई बार हम खुली आँखों से उतना सब नही देख पाते जितना आँखें बंद करके देख लेते हैं।
उसे सिगरेट से सख़्त नफ़रत थी और उसके जाने के बाद मैंने पीना ज्यादा कर दिया। जलती सिगरेट की चिंगारी देख मुझे यूँ लगता जैसे ये आग नही मैं उसका दिल जला रहा हूँ। इधर सिगरेट ख़त्म होती उधर मेरे बदले की भावना। कई बार आग सिर्फ़ जलाने के नही बुझाने के काम भी आती है।
मैंने बोलना बंद कर दिया था क्योंकि मैं चीखना चाहता था और चीखने वाले को पागल घोषित कर दिया जाता है। मैं पागल नही था बल्कि मैं तो अब पागलपन के दौर से बाहर आया था। कई बार हम किसी इंसान के इतने अंदर समा जाते हैं कि उसके बाहर हमें कुछ दिखाई देना बंद हो जाता है। फ़िर एक दिन बेहोशी टूटती है और हम ख़ुद को बीच सड़क पर पड़ा हुआ पाते हैं। पर उस दिन कोई हमें उठाने वाला नही होता क्योंकि इस दुनिया का उसूल है कि यहाँ गिरते हुए को संभालने वाले तो मिल जाएंगे पर जो गिरा है उसे उठाने के लिए कोई नही झुकना चाहता। मैंने ख़ुद को संभाला भी है और उठकर आगे भी चल पड़ा हूँ।
ख़ैर मेरे नंगे पाँव अब उस नर्म घास पर कभी नही चलना चाहते। उस जमीन पर चुभे काँटों के घाव अब सूख चुके हैं।
ये सारा दोष इस परफ्यूम की शीशी का है जो पता नही कैसे बची रह गयी और मुझे ये सब याद दिला गयी। शायद उसके जाने के बाद मैंने कभी परफ्यूम नही लगाया।
अमित 'मौन'
Monday, 22 February 2021
स्थिरता
कितनी ही दीवारें हैं
जिन्हें घर होने का इंतज़ार है
और मुसाफ़िर हैं कि
बस भटकते हुए दम तोड़ रहे हैं
जाने कितना ही वक़्त
खोजते हुए खर्च कर दिया
पर जो ढूँढ़ लिया
उसे संभालने का समय नही मिला
जल्द पहुँचने की ख़्वाहिश लिए
सुकून भरी छाँव छोड़ते रहे
पर कौन जाने इस लंबे सफ़र में
कोई और पेड़ मिले ना मिले
हम भागने के इतने आदी हो गए
कि रुकने को अस्थिरता समझने लगे
जबकि इस भाग-दौड़ का मक़सद
एक स्थायी पते की तलाश था
मन को इच्छाओं का ग़ुलाम बना लेना
अपने शरीर के साथ क्रूरता करना है।
अमित 'मौन'
Wednesday, 17 February 2021
मिलना
और शिष्टाचार में पूछ ही लिया
कैसे हो?
जवाब में ठीक हूँ कहने की हिम्मत
चाहकर भी नही जुटाई जा सकी
क्योंकि ठीक वैसा अब कुछ भी नही
हम जानते थे कि
तितलियों के पंख तोड़ लिए गए हैं
उपवन के पक्षी अब उड़ना भूल चुके हैं
झरनों में पानी की जगह अब काई ने ले ली है
और रातों में अब सिर्फ चमगादड़ बचे हैं
हम महसूस कर सकते थे कि
नसों में लहू अब आहिस्ता दौड़ा करता है
हृदय की गति अब मंद पड़ गयी है
घड़ी की सुइयों ने घूमना छोड़ दिया है
और लौटने के सभी रास्तों पर
नया शहर बसाया जा चुका है
फ़िर भी हम सलीके से मुस्कुराए
और अपने असहाय होंठों को
बचा लिया एक और झूठ के पाप से ।
अमित 'मौन'
Tuesday, 9 February 2021
अतीत
किसी अज्ञात शत्रु की तरह पीछे से वार करता है अतीत
बिल्कुल हृदयाघात
की तरह आकर लिपट जाता है
स्मृतियों के हथौड़े जब चलना शुरू करते हैं
तो दिमाग़ की नसों को लहूलुहान
कर देते हैं
कमीज़ पर लगा दाग हम जितना छुपाते हैं
वो उतना ही गाढ़ा होता जाता है
किशोरावस्था में आई मोच को
हम जवानी में नज़रअंदाज जरूर करते हैं
पर उसका दर्द बुढ़ापे में जीना दूभर कर देता है
हम अपने लिए कितना ही अलग रास्ता क्यों ना चुन लें
रास्ते में वो चौराहा जरूर आ जाता है
जहाँ पिछली रात किसी बुढ़िया ने टोटका किया होता है
कुछ हादसे नींदों के दुश्मन होते हैं
और कुछ निशान हमेशा के लिए बदन पर छपे रह जाते हैं।
अमित 'मौन'
आख़िरी तर्क: प्रेम
उपन्यास- आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...
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अगर मुझे मनुष्य होना सीखना हो तो मैं तुम्हारे मौन से शुरू करूँगा जहाँ करुणा किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती। अगर मुझे कोई प्रश्न सताने लगे त...
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यूँ ही कल झाड़ पोंछ में ज़हन की वक़्त की दराज़ से निकल आये कुछ ख़्याल पुराने जो कहने थे उनसे जो मौजूद नही थे सुनने के लिए.... कुछ ख़त जो लि...




