Wednesday, 28 April 2021

इच्छाशक्ति जगाए रखना

यह समय बड़ा ही मुश्किल है
भारी  भारी  सा  हर  पल   है
तुम ईश का ध्यान लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

युद्ध  बड़ा  जब  लड़ना  हो
ताकतवर से जब भिड़ना हो
तुम पूरा जोर लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब गति हृदय की बढ़ जाए
जब श्वास श्वास पर चढ़ जाए
जीने की आस लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब मन का सूरज घटता हो
और डर का साया बढ़ता हो
अपनों को गले लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब समय उचित आ जाता है
दानव  का  वध  हो  जाता  है
बस मानव धर्म बचाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

अमित 'मौन'

Wednesday, 31 March 2021

रश्क़

 रोज इसी वक़्त छत पर आओगी

तो पड़ोसी कानाफ़ूसी करेंगे
पकड़ी तुम जाओगी
और शामत मेरी आएगी

बिन बात मुस्कुराती हो
बेवज़ह चौंक जाती हो
जो किसी को भी शक हुआ
अपनी जासूसी हो जाएगी

अब आ ही गयी हो
तो बालों को खुला छोड़ो
चूम के ऊँगली उछाली है मैंने
गालों से ज़ुल्फें हवा उड़ाएगी

रोज रोज चुनर लहराओगी
तो बादलों को तकलीफ़ होगी
वो गुस्से में बड़बड़ाएंगे
और बारिश हो जाएगी

इन बालियों को कहो
इतना भी ना चमकें
कहीं सूरज जल गया अगर
मोहल्ले में रोशनी ना आएगी

यूँ जोर जोर गुनगुनाओगी
तो कोयल को रश्क़ होगा
वो बिगड़ी तो महीनों तक
फ़िर प्रेम गीत ना सुनाएगी

सोचो किसी शाम ऐसा भी हो
तुम आओ और मैं ना मिलूँ
बमुश्किल रात कटेगी तुम्हारी
बेचैनी रहेगी, नींद नही आएगी

मैंने तो लिख दी है कविता
अब तुम भी एक चिट्ठी लिखो
कब तक तुम्हारे दिल का हाल
मुझसे तुम्हारी सहेली बताएगी।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Tuesday, 2 March 2021

परफ्यूम

'मैं तो यही चाहूँगी कि हम बीच बीच में मिलते रहें, बाकी तुम्हारी मर्जी' ये उसकी आख़िरी लाइन थी जो मेरे कानों ने सुनी थी। उसके बाद हम कभी नही मिले।

एक आम आशिक़ की तरह मैंने भी कई बार उससे कहा था कि तुम आँखों से जादू टोना करती हो क्योंकि मैं जब भी इन्हें देखता हूँ बस खो जाता हूँ। सच बताऊँ तो उसकी आँखों को मैंने इतनी शिद्दत से देखा है कि उनका जादू मेरी आँखों में उतर आया है। मैं जब भी अपनी आँखें बंद करता हूँ तो उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। कई बार हम खुली आँखों से उतना सब नही देख पाते जितना आँखें बंद करके देख लेते हैं।

उसे सिगरेट से सख़्त नफ़रत थी और उसके जाने के बाद मैंने पीना ज्यादा कर दिया। जलती सिगरेट की चिंगारी देख मुझे यूँ लगता जैसे ये आग नही मैं उसका दिल जला रहा हूँ। इधर सिगरेट ख़त्म होती उधर मेरे बदले की भावना। कई बार आग सिर्फ़ जलाने के नही बुझाने के काम भी आती है।

मैंने बोलना बंद कर दिया था क्योंकि मैं चीखना चाहता था और चीखने वाले को पागल घोषित कर दिया जाता है। मैं पागल नही था बल्कि मैं तो अब पागलपन के दौर से बाहर आया था। कई बार हम किसी इंसान के इतने अंदर समा जाते हैं कि उसके बाहर हमें कुछ दिखाई देना बंद हो जाता है। फ़िर एक दिन बेहोशी टूटती है और हम ख़ुद को बीच सड़क पर पड़ा हुआ पाते हैं। पर उस दिन कोई हमें उठाने वाला नही होता क्योंकि इस दुनिया का उसूल है कि यहाँ गिरते हुए को संभालने वाले तो मिल जाएंगे पर जो गिरा है उसे उठाने के लिए कोई नही झुकना चाहता। मैंने ख़ुद को संभाला भी है और उठकर आगे भी चल पड़ा हूँ।

ख़ैर मेरे नंगे पाँव अब उस नर्म घास पर कभी नही चलना चाहते। उस जमीन पर चुभे काँटों के घाव अब सूख चुके हैं।

ये सारा दोष इस परफ्यूम की शीशी का है जो पता नही कैसे बची रह गयी और मुझे ये सब याद दिला गयी। शायद उसके जाने के बाद मैंने कभी परफ्यूम नही लगाया।

अमित 'मौन'


P.C. : GOOGLE


Monday, 22 February 2021

स्थिरता

कितनी ही दीवारें हैं

जिन्हें घर होने का इंतज़ार है

और मुसाफ़िर हैं कि
बस भटकते हुए दम तोड़ रहे हैं

जाने कितना ही वक़्त
खोजते हुए खर्च कर दिया
पर जो ढूँढ़ लिया
उसे संभालने का समय नही मिला

जल्द पहुँचने की ख़्वाहिश लिए
सुकून भरी छाँव छोड़ते रहे
पर कौन जाने इस लंबे सफ़र में
कोई और पेड़ मिले ना मिले

हम भागने के इतने आदी हो गए
कि रुकने को अस्थिरता समझने लगे
जबकि इस भाग-दौड़ का मक़सद
एक स्थायी पते की तलाश था

मन को इच्छाओं का ग़ुलाम बना लेना
अपने शरीर के साथ क्रूरता करना है।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Wednesday, 17 February 2021

मिलना

हम मिले सालों बाद
और शिष्टाचार में पूछ ही लिया
कैसे हो?
जवाब में ठीक हूँ कहने की हिम्मत
चाहकर भी नही जुटाई जा सकी

क्योंकि ठीक वैसा अब कुछ भी नही

हम जानते थे कि
तितलियों के पंख तोड़ लिए गए हैं
उपवन के पक्षी अब उड़ना भूल चुके हैं
झरनों में पानी की जगह अब काई ने ले ली है
और रातों में अब सिर्फ चमगादड़ बचे हैं

हम महसूस कर सकते थे कि
नसों में लहू अब आहिस्ता दौड़ा करता है
हृदय की गति अब मंद पड़ गयी है
घड़ी की सुइयों ने घूमना छोड़ दिया है
और लौटने के सभी रास्तों पर
नया शहर बसाया जा चुका है

फ़िर भी हम सलीके से मुस्कुराए
और अपने असहाय होंठों को
बचा लिया एक और झूठ के पाप से ।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Tuesday, 9 February 2021

अतीत

किसी अज्ञात शत्रु की तरह पीछे से वार करता है अतीत

बिल्कुल हृदयाघात की तरह आकर लिपट जाता है
स्मृतियों के हथौड़े जब चलना शुरू करते हैं
तो दिमाग़ की नसों को लहूलुहान कर देते हैं

कमीज़ पर लगा दाग हम जितना छुपाते हैं
वो उतना ही गाढ़ा होता जाता है
किशोरावस्था में आई मोच को
हम जवानी में नज़रअंदाज जरूर करते हैं
पर उसका दर्द बुढ़ापे में जीना दूभर कर देता है

हम अपने लिए कितना ही अलग रास्ता क्यों ना चुन लें
रास्ते में वो चौराहा जरूर जाता है
जहाँ पिछली रात किसी बुढ़िया ने टोटका किया होता है

कुछ हादसे नींदों के दुश्मन होते हैं
और कुछ निशान हमेशा के लिए बदन पर छपे रह जाते हैं।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


आख़िरी तर्क: प्रेम

उपन्यास-   आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...