Saturday, 26 May 2018

वो कविता सी स्वच्छंद सदा


वो कविता सी स्वच्छंद सदा
मैं ग़ज़लों सा लयबद्ध रहूँ

वो प्रेम त्याग की परिभाषा
मैं उसके लिये निबंध रहूँ

वो चाँद सी एक लालिमा लिये
मैं तारों सा बिखरा ही रहूँ

वो नदियों सी हर ओर बहे
मैं सागर सा ठहरा ही रहूँ

वो नाज़ुक कली जो फूल बने
मैं पौधे सा बढ़ता ही रहूँ

वो मस्त हवा के झोंके सी
मैं आँधी सा चलता ही रहूँ

वो मंद मंद मुस्कान लिये
मैं बिना वजह हँसता ही रहूँ

वो पहली बारिश सावन की
मैं ख़ुशबू बन मिट्टी में रहूँ

वो गंगा सी निर्मल पावन
मैं संगम बन के साथ रहूँ

वो चहुँ दिशाओं फैली हो
मैं मध्य धुरी बन जुड़ा रहूँ

वो तितली बन जब मंडराये
मैं गुलमोहर का फूल रहूँ

वो मधुमखी का छत्ता हो
मैं उन पेड़ों की डाल रहूँ

वो ठंड की कोई ठिठुरन हो
मैं जलता हुआ अलाव रहूँ


वो गौरैया जिन बागों की
मैं घने पेड़ की छाँव रहूँ

वो कोयल जैसी कूक लिये
मैं बगुले सा बस शांत रहूँ

वो जुगनू बन चमके जब भी
मैं स्याह अँधेरी रात रहूँ

वो छोर बने इस पृथ्वी का
मैं नील गगन बन साथ रहूँ

वो जंगल का एक झरना हो
मैं ऊँचा कोई पहाड़ रहूँ

वो ओस की पहली बूँद बने
मैं हरी घास बन उगा रहूँ

वो मन मंदिर की मूरत हो
मैं सजदे में बस झुका रहूँ

 

वो सात सुरों के सरगम सी
मैं उसको सुन बस 'मौन' रहूँ



By - Amit Mishra 'मौन'

8 comments:

  1. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २८ मई २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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    1. जी हार्दिक आभार आपका

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  2. बहुत सुन्दर अंतर खोज के कविता के छंद बांधे हैं ... लाजवाब ...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  3. बहुत सुन्दर

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. बहुत सुंदर रचना कोमल निर्मल ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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