Tuesday, 22 October 2019

प्रियतम

इतनी उत्तेजित होती हो
सहसा ही सुन के नाम मेरा
यानी कि विह्वल तुम भी हो
छीना है जो आराम मेरा

जब साँझ ढले जब चाँद चले
उस पल में प्रियतम आ जाना
मैं गति हृदय की रोकूँगा
अधरों से पान करा जाना

जब पंछी क्रीड़ा करते हों
और पवन में ख़ुशबू फैली हो
जब दिन करवट ले सो जाए
फ़िर काली रात अकेली हो

जब शोर नही सन्नाटा हो
फ़िर जुगनू दिए जलाएंगे
जब पुष्प बिछे हों राहों में
यानी कि प्रियतम आएंगे

जब हार भुजा का डल जाए
प्रियतम थोड़ा सकुचा जाना
जिस प्रहर प्रेम की बातें हों
तुम विदा को ना अकुला जाना

जब घड़ी मिलन की आ जाए
तुम पूर्ण समर्पण कर देना
संवाद नयन से होगा जब
तुम प्रेम हृदय में भर लेना

अमित 'मौन'



Image Source-GOOGLE

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-10-2019) को    "आम भी खास होता है"   (चर्चा अंक-3497)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. वाह शृंगार रस का उत्कृष्ट सृजन।
    बहुत सरस सुंदर भाव भरी रचना।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  3. बहुत सुंदर मनोभाव। बधाई।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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