Tuesday, 31 March 2020

सब लौट गए

तुम्हारी देह एक दीवार और काँधे खूँटी थे
पहली बार आलिंगनबद्ध होते ही 
मैं वहीं टंगा रह गया
तुमने जुल्फों तले मुझे छुपाया तो लगा 
उम्र भर की छांव मिल गयी
तुम्हारी हँसी मेरा हौसला बढ़ाती रही
तुम्हारे हृदय की धड़कन को 
मैं जीवन संगीत समझता रहा
तुम्हारी पीठ पर उंगलियां फिराते हुए लगा कि
अब ऐसे ही चलते हुए ये जीवन का सफ़र कट जाएगा ।

फिर एक दिन तुमने कंधे हटा लिए
और मैं नीचे आ गिरा 
मेरी आँखों से गिरे आँसू 
एक चिपचिपा लेप बनकर 
मेरे चारों ओर फैल गए
मैं उसी जगह चिपक गया जहाँ गिरा था ।

उसके बाद कई लोग आए 
जिन्होंने मुझे उठाने का भरसक प्रयास किया
पर मैं आज तक उठ नही सका ।

सब लौट गए
पर मैं अब भी वहीं पड़ा हूँ
वहीं जहाँ तुमने झटक के मुझे गिराया था ।

अमित 'मौन'

6 comments:

  1. मर्मस्पर्शी रचना

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (02-04-2020) को   "पूरी दुनिया में कोरोना"   (चर्चा अंक - 3659)    पर भी होगी। 
     -- 
    मित्रों!
    कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं भी नहीं हो रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत दस वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  3. बहुत सुन्दर

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