Wednesday, 22 April 2020

आह

पृथ्वी को चोट पहुँचाने वाली हर त्रासदी की वजह एक आह बनी। आह जिस किसी भी जीव के भीतर से निकली, उसका असर उतना ही भयावह रहा जितना एक बदले की भावना का होता है।

नावों के तलों से घायल हुई मछलियों के आँसू बाढ़ बनकर कितने ही किनारों को निगल गए।

आसमान में शोर करते जहाजों से डरकर जितने भी पक्षियों ने पंख गंवाए उन सभी ने साथ मिलकर उड़ान भरी तो आँधी बनकर सबको अपने साथ उड़ा ले गए।

जंगलों की कटाई से बेघर हुए सभी कीड़ों ने एकजुट होकर ऐसा विष बनाया जो वायरस बनकर कितनों को ज़मीदोज़ कर गया।

अनगिनत लाशों के ढेर पर चढ़कर सम्राट बने हर राजा को उसकी क़ीमत ऐसे ही किसी हमले में हारकर और फ़िर मृत्यु को प्राप्त कर चुकानी पड़ती है।

अमित 'मौन'

14 comments:

  1. बहुत सुन्दर।
    विश्व पुस्तक दिवस और धरा दिवस की बधाई हो।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार(२५-०४-२०२०) को 'पुस्तक से सम्वाद'(चर्चा अंक-३६८२) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

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  3. जंगलों की कटाई से बेघर हुए सभी कीड़ों ने एकजुट होकर ऐसा विष बनाया जो वायरस बनकर कितनों को ज़मीदोज़ कर गया।
    आह लग गयी मानवता पर....
    बहुत सुन्दर सार्थक सृजन

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. बिलकुल सही कहा आपने ,उनकी आहों का असर ही है ये ,सादर नमन

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  5. बहुत बढ़िया

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  6. गहन चिंतन परक रचना।

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