Monday, 24 August 2020

और फ़िर ऐसे समय में

आज खोया आसमां है

काले मेघों से घिरा है
रोक दो इन बारिशों को
डूबी जाए अब धरा है।

आँसुओं की उठती लहरें
नयन का सागर भरा है
शूल बन कर चुभती यादें
घाव अब तक वो हरा है।


और फ़िर ऐसे समय में
आ बसी हो तुम हृदय में
अस्त होती हैं उम्मीदें
कोई रुचि है ना उदय में।

घटती साँसें पूछे मुझसे
वक्त कितना है प्रलय में
शून्य जीवन करके भी तुम
क्यों रुकी हो अब हृदय में।

क्यों रुकी हो अब हृदय में...

अमित 'मौन'


P.C. : GOOGLE

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (26-08-2020) को   "समास अर्थात् शब्द का छोटा रूप"   (चर्चा अंक-3805)   पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. बहुत सुंदर सृजन, हृदय स्पर्शी।

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  4. मन की पीड़ा को शब्द दे दिए जैसे ...
    गहरा भाव चिंतन ... ख़ुद से तरल वार्तालाप ... उदासी का भाव, टीस उठती है मन में जैसे ...
    सुंदर रचना ...

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