Friday, 11 December 2020

समझदारी

जब तक हम साथ थे तब तक तो तुमने कभी इतनी ख़ूबसूरत कविताएं नही लिखीं और जहाँ तक मैं समझती हूँ कि मुझसे पहले और मेरे बाद अभी तक कोई और ऐसा नही आया जिसे सोचकर तुम कविताएं लिखते हो (बातों ही बातों में उसने मुझसे सवाल किया)


मैं जो पिछले दस मिनट से उसे अपलक निहारे जा रहा था (अब क्योंकि पूरे एक साल बाद उसे देखा था तो मैं उसकी पेंटिंग अपनी आँखों के कैनवस पर उतार लेना चाहता था), एकदम से सकपकाते हुए बोला- जब आप किसी के रहते हुए उसे उपमाओं में बाँध लेते हो तो उसके साथ आपका रहना मुश्किल हो जाता है। खासकर तुम जैसी सतरंगी लड़की के साथ।

क्या मतलब (वो चौंक कर बोली)?

मैं (मुस्कुराते हुए)- देखो मेरा कहने का मतलब है कि अगर मैं तुम्हारे रहते हुए तुम पर कविता लिखता और तुम्हें कोई उपमा देता तो मैं अपनी कविता को सच करने के लिए तुम्हे उसी रूप में देखने की लालसा रखता। जबकि तुम तो इंद्रधनुषी रंग में डुबा कर बनाई गई हो। जब भी मिलती थी तुम्हारा एक अलग ही रंग देखने को मिलता था।

थोड़ा और समझाने की कृपा करोगे (वो अजीब सा मुँह बनाते हुए बोली)

मैं- देखो अगर मैं तुम्हे गुलाब लिखता तो तुम्हारा सूर्यमुखी वाला चेहरा मुझे पसंद नही आता और अगर तुम्हारी नमकीन बातों का बखान अपनी कविता में करता तो तुम्हारी मिश्री वाली बातें मुझे सुनने में अच्छी नही लगती। यानी कि मैं तुम्हे हर रूप, हर चेहरे, हर बात, हर व्यवहार के साथ अपनाना चाहता था, तुम्हारी किसी विशेष या मेरी मनपसंद बातों के साथ नही और कविता में हमेशा किसी ख़ूबी का बखान किया जाता है। इसीलिए मैंने तुम्हारे साथ होते हुए तुम्हें किसी कविता तक सीमित नही किया।

यार तुम्हारी ऐसी ही बड़ी बड़ी और निराली बातें मुझे बोर किया करती थी पर सच कहूँ तो इस एक साल में मैंने इन्हें बहुत मिस किया। तुम किसी के भी अशांत मन को अपनी बातों से शांत कर सकते हो लेकिन क्या है ना कि लगातार एक जैसी बातें करते रहने और सुनते रहने से ज़िंदगी बोरिंग बन जाती है और समझदारी एक उम्र के बाद ही आये तो अच्छा है। क्योंकि जो मजा बेवकूफ़ और पागल बन के जीने में है ना वो समझदारी में नही (ये कहते हुए उसके चेहरे के भाव में वो संतोष था मानो वो बताना चाह रही हो कि उसका जाने का फैसला बिल्कुल सही था)

अमित 'मौन'


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Monday, 7 December 2020

फॉर्मूला

सड़कें हमें कहीं नही पहुँचाती
हम सड़क पर चलते हैं और गलत जगह पहुँच जाते हैं।

दुःख भी हम तक चल कर नही आते
कुछ अलग होता है और हम दुःखी हो जाते हैं।

हम किसी को याद नही करते
पर कुछ लोग याद आ जाते हैं।

भूलने का कोई फॉर्मूला नही होता
जिसे हम सोचते नही उसे हम भूल जाते हैं।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Thursday, 3 December 2020

मोरपंख

पुरानी किताबों के पन्ने पलटते हुए एक मोरपंख हाथ लगा। उसे देखते ही मन जैसे ख़ुद बख़ुद फ्लैशबैक में चला गया। ये फ़्लैशबैक शब्द मैंने पहली बार फिल्मों में सुना था और वो फ़िल्म भी शायद इस मोरपंख को देने वाले के साथ ही देखी थी।

अचानक ये मोरपंख वाला किस्सा याद आया। किसी ने कहा था किताबों में मोरपंख रखने से पढ़ा हुआ जल्दी याद हो जाता है। पर ये कोई कोर्स की किताब तो थी नहीं, फिर भी वो चाहती थी कि ये मोरपंख मैं इस किताब में रखूं (क्योंकि ये किताब उसी ने मुझे पढ़ने के लिए दी थी) तो उसने ये बोल के रखवाया था कि इस किताब की कहानी में कुछ सीख ऐसी है जो जीवन में काम आएगी और इसी सीख को याद रखने के लिए मुझे ये मोरपंख इसमें रखना होगा।

अब इसे किस्मत कहो या संयोग कि अब इस किताब की कहानी मेरी ख़ुद की कहानी हो गयी है और ये मोरपंख मुझे याद दिला रहा है कि मेरी कहानी का अंजाम याद रखने के लिए मुझे पहले ही तैयार कर दिया गया था।

मुझे समझ नही आ रहा कि कहानीकार का शुक्रिया अदा करूं, किताब देने वाले का धन्यवाद करूं या फ़िर मुझे इस कहानी का हिस्सा बनाने वाले का आभार प्रकट करूं।

वैसे मुझे लगता है कि जब आप ढेर सारी कहानियाँ पढ़ते हैं तो कभी ना कभी कोई ना कोई कहानी ऐसी जरूर होती है जिसे आप ख़ुद से जोड़ कर देखने लगते हैं या यूँ कहें वो कहानी आपको अपनी कहानी लगने लगती है।

अब जो भी हो मगर ये पुरानी किताबों को किसी और को पढ़ने के लिए देने का मेरा आईडिया फ़िर से पुराना हो गया और मैंने फ़िर से इन किताबों को वहीं रख दिया जहाँ से इन्हें निकाला था।

अमित 'मौन'


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Saturday, 28 November 2020

भाग्यशाली

सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलू हैं। पर विडम्बना ये है कि कभी कभी हमारे हिस्से वो सिक्का आता है जिसके दोनों पहलू में दुःख ही छिपे होते हैं।

ऐसे में भाग्य का सिर्फ़ इतना महत्व होता है कि वो सिक्के को उछालने के बाद ज़मीन पर गिरने ही ना दे।

मैं अपने जीवन में सिर्फ़ इतना भाग्यशाली रहा कि जब मैं कोई सुखी सपना देख रहा होता हूँ तब दुःख मेरे सिरहाने बैठ कर मेरे जागने का इंतज़ार कर रहा होता है।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Friday, 20 November 2020

प्रेमी

चलते चलते अचानक
रास्ता बदल लोगे
तो भुलक्कड़ लगोगे।

दोस्तों को देखोगे
और मुँह फेर लोगे
हर पल तन्हा रहोगे।

किताबें खोल के बैठोगे
और कुछ नही पढ़ोगे
तो अनपढ़ दिखोगे।

सुबह शाम बिना वजह
किसी भी गली भटकोगे
तुम आवारा बनोगे।

साइकल खड़ी रहेगी
और तुम पैदल चलोगे
वक़्त बर्बाद करोगे।

कितना कुछ कहना होगा
पर चुप ही रहोगे
ऐसे ही गुस्सैल बनोगे।

आँखें बंद रहेंगी
पर सो ना सकोगे
अक़्सर ही बेचैन रहोगे।

किसी एक की ख़ातिर
जब इतना कुछ सहोगे
तब जाकर तुम प्रेमी बनोगे।

अमित 'मौन'

P.C. : GOOGLE


Monday, 9 November 2020

कहो कवि अब क्या लिखोगे??

तुमने भूख लिखी

किसी भूखे ने नही पढ़ी
भूखे को रोटी चाहिए कविता नही
कहो रोटी दे सकते हो क्या?

तुमने बेरोजगारी लिखी
वो किसी काम की नही
आदमी को काम और पैसे चाहिए
काग़ज पर छपी कविता नही
कहो काम दे सकते हो क्या?

तुमने व्यंग्य लिखा
पर किसी को हँसी नही आई
सुधार हँसी ठिठोली से नही आते
मिल कर कदम बढ़ाने पड़ते हैं
कहो बदलाव ला सकते हो क्या?

तुमने दर्द लिखा
पर किसी के मन को नही छुआ
सबका दिल दर्द से भरा निकला
यहाँ सबका ज़ख्म हरा निकला
कहो इलाज कर सकते हो क्या?

अच्छा सुनो
लिख सकते हो तो समाधान लिखो
क्योंकि समस्याएं बहुत हैं

लिख सकते हो तो जवाब लिखो
क्योंकि सवाल बहुत हैं

कहो लिख पाओगे क्या??


अमित 'मौन'


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Sunday, 1 November 2020

आओ बैठो और बात करो

क्या बात हुई वो बात कहो

आओ बैठो और बात करो
हैं नाज़ुक लब क्यों सिले हुए
अब शिकवों की बरसात करो।

जो बीत गया वो जाने दो
बातों को बाहर आने दो
इस मन का बोझ उतारो भी
कर लो गुस्सा और ताने दो।

यूँ चुप रहने से क्या होगा
घुट कर सहने से क्या होगा
अब कह भी दो ये बिन सोचे
आख़िर कहने से क्या होगा।

जो आज नही तो कल होगी
मिलकर ही मुश्किल हल होगी
बस कोशिश भर की दूरी है
फ़िर साथ ख़ुशी हर पल होगी।

अमित 'मौन'

    
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Wednesday, 21 October 2020

तिल

मुझे शुरू से ही ख़ामोशियों से बड़ा लगाव था और तुम्हें चुप्पियों से सख़्त नफ़रत थी। हमारे बीच हर बार हुई घंटों लंबी बातचीत में सबसे ज्यादा योगदान तुम्हारा ही हुआ करता था। माँ-बाबा से मिली डाँट, भाई से हुई नोक-झोंक और टीचर से मिली शाबाशी से लेकर सहेलियों के साथ हुई कानाफूसी तक कुछ भी ऐसा नहीं बचा जो तुमने मुझे नही बताया हो। मुझे तुम्हे सुनना हमेशा अच्छा लगता था, इसलिए नही की वो बातें मेरे काम की होती थी बल्कि इसलिए कि उन सारी बातों की वजह से मुझे चुप रहने और तुम्हें देखते रहने का मौका मिल जाता था। यकीन मानो तुम्हारे चेहरे को मैंने इतने ध्यान से देखा है कि तुम्हारे कान की सभी बालियों के डिज़ाइन तक याद हो गए हैं।


कभी कभी तुम्हें मेरी होशियारी का पता भी लग जाता था और तुम मेरी तरफ़ पीठ करके आसमान की ओर देखने लगती थी। मैं फ़िर भी तुम्हे ध्यान से देखता रहता था। तुम्हारी गर्दन के ठीक नीचे, पीठ पर उगा वो तिल मुझे हमेशा अपनी तरफ आकर्षित करता था। वो तिल शायद जानता था कि मैंने तुम्हे इतने ध्यान से पढ़ा है कि एक दिन मैं तुम्हे लिखना शुरू कर दूंगा। उस तिल को शायद अपनी जगह से शिकायत थी, उसे लगता था कि हर कोई बस चेहरे के किसी हिस्से पर उगे तिल की तारीफ़ करता है और उसकी जगह ऐसी थी कि वहाँ ख़ुद उस तिल का मालिक भी उसे नहीं देख सकता था। पर मैं उसे भी निहारता था क्योंकि वो भी तुम्हारा ही हिस्सा था।

मुझे अंदाज़ा नही था कि एक दिन तुम बहुत दूर चली जाओगी। इतनी दूर की जहाँ से वापसी की कोई सड़क नही बनी। तुम शायद इसीलिए आसमान की तरफ़ देखा करती थी क्योंकि तुम्हें पता था कि बाद में वहाँ रहकर तुम हर पल मुझे निहार सकती हो पर मैं तुम्हे नही देख पाऊंगा। तुम शायद ये नही जान पाई कि तुम मेरे ज़हन में इतनी अच्छी तरह बसी हुई हो कि मैं बिना सोचे तुम्हारी तस्वीर बना सकता हूँ पर तुम ये जरूर जानती थी कि मुझे तस्वीर बनाना नही आता। मैंने तुम्हें रट रट कर पढा है इसलिए अब अक़्सर तुम्हे लिखा करता हूँ। मेरी यादों में तुम एक किताब हो जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही पढ़ सकता हूँ। मैं अक़्सर उस किताब का कोई अध्याय काग़ज पर लिख लिया करता हूँ। मैंने सोचा है कि मेरे दुनिया से जाने के पहले इस किताब के सारे अध्याय लिख लूंगा। पर लाख कोशिशों के बावजूद एक बार में एक पेज से ज्यादा नही लिख पाता। मेरे हाथ काँपने लगते हैं और आँखें धूमिल हो जाती हैं।

आज मैं सिर्फ़ पीठ का तिल लिख पाया हूँ और आँखों से एक बूँद काग़ज पर गिर गयी है। शायद ये बूँद स्याही में मिलकर तिल बन जाएगी।

अमित 'मौन'


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Sunday, 11 October 2020

बदलाव

हम दुःखों से घिरे होते हैं पर दिन नही कटते
हम नींद में होते है और दिन बदल जाते हैं।

हम मिन्नतें करते हैं पर बारिश नहीं होती
हम उदास बैठते हैं बादल चले आते हैं।

आँधियाँ ज़ोर लगाती हैं पत्ते नही गिरते
मौसम बदलता है पत्ते गिर जाते हैं।

कुछ ज़ख़्मों पर दवा असर नही करती 
कुछ घाव बिना दवा के सूख जाते हैं।

हम दुनिया से लड़ते हैं पर ख़ुद को नही बदलते
हम प्रेम में होते हैं और हम बदल जाते हैं।

कुछ बदलाव वक़्त के साथ आते हैं
और हमें लगता है लोग बदल जाते हैं।

अमित 'मौन'

Wednesday, 7 October 2020

शब्दविहीन

एक बात के कई मतलब निकालने वाली इस दुनिया ने कई बार उन शब्दों के भी मतलब निकालने चाहे जिनका अर्थ समझाने के लिए शब्द बन ही नही सके। कई बार हम समझ ही नही पाते कि कुछ अर्थों को शब्दों से नही भावनाओं से समझा जाता है।

हम बहुत ख़ुश होते हैं तो ख़ुशी बयान नही कर पाते और दुःखी होते हैं पर दुःख व्यक्त नही कर सकते।

ख़ुशी क्या होती है ये अपने पहले बच्चे को गोद में लेने के बाद पता चलता है और दुःख क्या होता है ये उस स्त्री से बेहतर कौन जान सकता है जिसने मंगलसूत्र पहनने का सौभाग्य खो दिया हो।

निराशा किसे कहते हैं ये उस किसान को मालूम है जिसको महीनों की मेहनत के बाद भी लहलहाती फ़सल देखना नसीब नही हुआ और चिंता भला उस पिता से बेहतर कौन जानेगा जिसकी बेटी की उम्र समाज के हिसाब से हाथ पीले करने की हो गयी हो।

गर्व करने के लिए आपको उस सिपाही का पिता बनना पड़ेगा जिसके बेटे को देश की सेवा के लिए एक विशेष समारोह में सम्मान मिल रहा हो और शर्मिंदगी का अनुभव एक अपराधी का परिवार जानता है।

दया भाव को वही महसूस कर सका है जिसने दर्द से कराह रहे किसी बेजुबान जानवर को सड़क से उठा कर उसका इलाज किया हो और समर्पण को वही समझ सका जिसने किसी के कंधे पर सर रखकर आँखें मूंद ली हों।

तुमसे मिलकर मैंने जाना कि पाने की ख़ुशी क्या होती है और तुम्हारे जाते ही मैंने खोने की पीड़ा को समझा।

हम ज़िंदगी को जितना करीब से जानने की कोशिश करते हैं उतना ही ख़ुद को शब्दविहीन पाते हैं। हम देखी-सुनी बातों को भले ही कविता या कहानी में ढालने में सक्षम हों पर अनुभवों को लिखने के लिए हमें कभी भी सटीक शब्द नही मिल पाते। हम कितना भी लिख लें पर आख़िरी पंक्ति के बाद भी बहुत कुछ छूट गया लगता है।

कुछ बातें अपने कहे जाने के इंतज़ार में दम तोड़ देती हैं।

अमित 'मौन'


P.C. - GOOGLE

मनुष्य

अगर मुझे मनुष्य होना सीखना हो तो मैं तुम्हारे मौन से शुरू करूँगा जहाँ करुणा किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती। अगर मुझे कोई प्रश्न सताने लगे त...