Friday, 20 November 2020

प्रेमी

चलते चलते अचानक
रास्ता बदल लोगे
तो भुलक्कड़ लगोगे।

दोस्तों को देखोगे
और मुँह फेर लोगे
हर पल तन्हा रहोगे।

किताबें खोल के बैठोगे
और कुछ नही पढ़ोगे
तो अनपढ़ दिखोगे।

सुबह शाम बिना वजह
किसी भी गली भटकोगे
तुम आवारा बनोगे।

साइकल खड़ी रहेगी
और तुम पैदल चलोगे
वक़्त बर्बाद करोगे।

कितना कुछ कहना होगा
पर चुप ही रहोगे
ऐसे ही गुस्सैल बनोगे।

आँखें बंद रहेंगी
पर सो ना सकोगे
अक़्सर ही बेचैन रहोगे।

किसी एक की ख़ातिर
जब इतना कुछ सहोगे
तब जाकर तुम प्रेमी बनोगे।

अमित 'मौन'

P.C. : GOOGLE


14 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 21 नवंबर नवंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (22-11-2020) को  "अन्नदाता हूँ मेहनत की  रोटी खाता हूँ"   (चर्चा अंक-3893)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  3. बहुत सुंदर रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. बहुत सुंदर

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  5. प्रेम का इतना बड़ा इम्तहान...वाह अम‍ित जी क्या खूब ल‍िखा क‍ि किताबें खोल के बैठोगे
    और कुछ नही पढ़ोगे
    तो अनपढ़ दिखोगे।

    सुबह शाम बिना वजह
    किसी भी गली भटकोगे
    तुम आवारा बनोगे।...वाह

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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