Saturday, 27 April 2019

कठिन डगर पे चल के ही तू मंज़िलों को पाएगा

जो वक़्त की बिसात पे
तू हौसले बिछाएगा
फ़लक नही है दूर फिर
सितारे तोड़ लाएगा

आँधियों के वेग में
अडिग खड़ा रहा अगर
रुख़ हवाओं का तू फिर
ख़ुद ही मोड़ पाएगा

कदम को कर कठोर तू
ख़ुद को जो जलाएगा
सदमें हर सफ़र के फिर
हँस के झेल जाएगा

निराश हो के रुक नही
हताश हो के थक नही
आशा की पतंग को
स्वयं ही तू उड़ाएगा

पर्वतों को तोड़ के
जो रास्ते बनाएगा
एक दिन ज़माना भी
पीछे पीछे आएगा

निगाह तेरी लक्ष्य पे
तू मुश्किलों से डर नही
कठिन डगर पे चल के ही
तू मंज़िलों को पाएगा

अमित 'मौन'

20 comments:

  1. कठिन डगर पे चल के ही
    तू मंज़िलों को पाएगा

    प्रेरक और खूबसूरत रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका🙏

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सरदार हरि सिंह नलवा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. हार्दिक आभार आपका🙏

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  3. सच है की कठीन रास्तों पर चलना होता है मंजिल इतना आसान नहीं होती .. ख्वाब जो ऊंचे होते हैं ...
    बहतरीन रचना है ...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका🙏

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  4. बेहतरीन रचना

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 1 मई 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. हार्दिक आभार आपका🙏

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  6. बेहतरीन रचना आदरणीय
    सादर

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  7. प्रेरणादायक रचना

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    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  8. प्रेरक भावों से सजी रचना अमित जी। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

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    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  9. निगाह तेरी लक्ष्य पे
    तू मुश्किलों से डर नही
    कठिन डगर पे चल के ही
    तू मंज़िलों को पाएगा
    बहुत खूब ,सादर

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  10. उत्साहवर्धक कविता के लिए आभार.....शब्दों के अर्थ के साथ कविता की सुन्दरता बढ गई ....

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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