Tuesday, 20 March 2018

हिज़्र की रात

ये हिज़्र  की  रात है  लंबी चलेगी
टीस है  दिल में बहुत ही  खलेगी

जमाने से नज़रें मिलायें भी कैसे
मेरी इन आँखों में नमी सी रहेगी

चलेंगी हवायें  तो  पहले के जैसी
मगर इनमे उसकी महक ना रहेगी

चिराग़ों का क्या है ये जलते रहेंगे
मगर इस लौ में  रौशनी  ना रहेगी

चमन में सितारे भी बिखरे हुये  हैं
मगर इनमे उसकी कमी सी रहेगी

अंधेरों में खुद को कैद तो  कर लूँ
यादों की खिड़की खुली ही रहेगी

'मौन' हैं  ग़ज़लें  लफ्जों की कमी है
अब उसके बिना महफ़िल ना जमेगी

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