Sunday, 15 April 2018

बुलंद इरादे

जाने क्यों हर रोज बस एक ख़्वाब आता है
बोसे लेने को इस जमीं पे माहताब आता है

सवालों की फ़ेहरिश्त बड़ी लंबी हो चली थी
दूर फ़लक से उन  सभी का जवाब आता है

अँधेरे की एक चादर  लिपटी  हुई  है बदन से
डर को भगाने खिड़की पे आफताब आता है

कई  रोज गुजरे  इन  मायूसियों  में कैद  हुए
तोड़ने  जंजीरें  सभी अब  इंकलाब आता है

नाउम्मीदी  के  भंवर में  अब  उलझना  कैसा
बढ़ाने कश्ती मेरी हौसलों का सैलाब आता है

निकला  जो 'मौन'  बुलंद  इरादे  साथ लेकर
लौटकर  हर शख्स  फिर  कामयाब आता है

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, शाबाश टीम इंडिया !! “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. जी बहुत बहुत धन्यवाद आपका🙏

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सोच

कभी उत्साही और उद्दंड है,  कभी खुद पे ही  घमंड है कभी प्रखर कभी प्रचंड है, सोच का न कोई मापदंड है अगर जो ये  कुरूप है,  फिर कार्य उसी  ...