Wednesday, 17 April 2019

हर रात वही किस्सा, मुझमें बाकी है तेरा हिस्सा

तन्हाई के तकिये तले जलती रही
एक आस की लौ

आँसुओं की ओस में भीग रही
दो अधखुली आँखें

पलकों के दरवाजे पर दस्तक
दे रही है नींद

इंतज़ार में अपनी बारी के
थक गया है ख़्वाब

सितारों संग रात की चौकीदारी में
लगा रहा वो चाँद

और फिर हर्फ़ की मद्धम आँच में
पक गयी एक नज़्म

अमित 'मौन'

10 comments:

  1. नज़्म यूं ही पका करती है

    सुंदर रचना

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 17/04/2019 की बुलेटिन, " मिडिल क्लास बोर नहीं होता - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. हार्दिक आभार आपका🙏

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  3. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. सुंदर प्रस्तुति

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