Saturday, 24 August 2019

शब्दों की माला

मैं  चाहूँ  तुझे  ही, ये  कैसे  बताऊँ
जो पढ़ के ना समझे तो कैसे जताऊँ

देखूँ तुझे तो मैं, ख़ुद ही को भूलूँ
यूँ  चेहरे से नज़रें  मैं कैसे हटाऊँ

ना दूरी  कोई, रह गयी  दरमियाँ है
है सूरत बसी दिल में कैसे दिखाऊँ

आँखें  जो  मूंदूँ, तू  ही  सामने हो
मैं ख़्वाबों में अपने तुझे ढूँढ़ लाऊँ

सोहबत की चाहत, बड़ा कोसती है
ये  दूरी  है  दुश्मन  ये  कैसे  मिटाऊँ

ये शब्दों की माला, तुझे करके अर्पण
कविता  में अपनी  मैं तुझको सजाऊँ

अमित 'मौन'

8 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं!!


    ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/08/2019 की बुलेटिन, " कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. सादर आभार आपका....जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं आपको

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-08-2019) को "ढाल दो साँचे में लोहा है गरम" (चर्चा अंक- 3439) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुंदर अर्पण ,समर्पण आपके सृजन से ।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  4. वाह वाह क्या माला पिरोई है शब्दों की | बहुत ही कमाल बहुत ही अनुपम |

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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