Sunday, 18 August 2019

बाकी है एक उम्मीद

यूँ ही कल झाड़ पोंछ में ज़हन की
वक़्त की दराज़ से निकल आये
कुछ ख़्याल पुराने
जो कहने थे उनसे
जो मौजूद नही थे
सुनने के लिए....

कुछ ख़त
जो लिखे गए थे
उनकी याद में
जिनका पता मालूम न था...

वो बातें
जिनके जवाब के इंतज़ार में
एक उम्र गुजरी है तन्हाई में...

आज भी संभाले रखी है
वो गुफ़्तगू की ख़्वाहिश
जो करनी थी उनसे
किसी चाँदनी रात में
खुले आसमां के नीचे
जब तारों की टिमटिमाती रोशनी
लबों पे यूँ पड़ती मानों
बातों से गिरते हों मोती कई....

और समेट लेता मैं
उस ख़ज़ाने को उम्र भर के लिए
और देखा करता हर रोज़
मोतियों में तुम्हारे अक़्स को...

ख़ैर वो मोती ना सही
पर वो ख़्याल अभी भी सहेज रखें हैं
क्योंकि ज़िंदगी बाकी है अभी
और बाकी है एक उम्मीद...

अमित 'मौन'

20 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-08-2019) को "सुख की भोर" (चर्चा अंक- 3433) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उमीदों के सहारे ... क्योंकि जिंदगी बाकी है अभी ...
    गहरा लाजवाब ख्वाब ...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  3. सुन्दर व सार्थक अभिव्यक्ति, बधाई

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका

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  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 21अगस्त 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. बहुत सुन्दर

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  6. बहुत ही शानदार उम्मीद ।
    उम्दा प्रस्तुती।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  7. बहुत सुंदर और सार्थक रचना

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    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  8. कुछ ख़त
    जो लिखे गए थे
    उनकी याद में
    जिनका पता मालूम न था...
    वाह!!!!
    क्योंकि ज़िंदगी बाकी है अभी
    और बाकी है एक उम्मीद...
    लाजवाब सृजन

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  9. बहुत ही सुंदरता से मन के भावों को व्यक्त किया है बहुत सुन्दर.

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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