Sunday, 19 May 2019

अस्थायी रिश्ते..

अस्थायी रिश्ते:

कुछ रिश्ते गमले में उगी घास की तरह होते हैं...
घास जो अचानक ही पेड़ के आस पास उग आती है उसके चारों ओर एक सुंदर हरियाली छटा बनकर उसकी शोभा बढ़ाती है...
फिर या तो वो ख़ुद ही सूख जाती है या काट दी जाती है....
क्योंकि पौधे को विकास के लिए उस घास को छोड़ना पड़ता है...

इसी तरह आगे बढ़ने के क्रम में हमें कुछ रिश्तों से विदा लेनी पड़ती है...

जिस तरह बार बार घास उस पौधे के आस पास फिर से उगती और सूखती रहती है..ठीक उसी तरह हमारे जीवन में भी लोग आते और जाते रहते हैं...

सफ़र में कई ख़ूबसूरत पड़ाव मिलते हैं जहाँ हम सोचते हैं कि काश यहीं रुक जाएं...पर मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें आगे बढ़ना ही पड़ता है....

अमित 'मौन'

4 comments:

  1. बहुत सुंदर बात कही आपने शानदार लेखन ज़िंदगी रुक के नहीं चलती मंज़िल पाने के लिए बहुत कुछ त्यागना पड़ता है

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपका

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  2. बिलकुल सत्य, लेकिन अक्सर मंजिल पर पहुंच हम तन्हा रह जाते हैं ,सादर

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    1. आपके कथन से सहमति रहेगी..धन्यवाद

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