Monday, 10 June 2019

उस गुल का मैं हूँ माली

तिल काला  गोरे गालों पे, उस पर  होंठों की लाली
चले तो ऐसी कमर हिले, हो जैसे गुड़हल की डाली

नैन कटीले जिगर को चीरें, पास बुलाए है बाली
ज़ुल्फ़ उड़े तो हवा चले, आए बागों में हरियाली

झुकें जो पलकें दिन ढल जाए, हँसे तो फैले खुशहाली
पैजनिया की  धुन पे  नाचे, फ़िज़ा भी  होके  मतवाली

अधरों का आकर्षण है, ज्यों भरी हुई  मधु की  प्याली
रश्क करे  चँदा भी जिससे,  उस गुल का  मैं हूँ  माली

अमित 'मौन'

6 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/06/2019 की बुलेटिन, " गिरीश कर्नाड साहब को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. सुंदर रचना...
    ज़ुल्फ़ उड़े तो हवा चले, आए बागों में हरियाली
    क्या कहने

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