Tuesday, 2 July 2019

एक नज़र उसको देखूँ तो मर जाऊं

चाहता  मैं भी  हूँ  मैं  उधर जाऊं
है नही वो वहाँ फ़िर भी घर जाऊं

गाँव की सारी गलियों में देखा उसे
ढूँढ़ने  अब  उसे  मैं  शहर  जाऊं

इश्क़  का  दे रहे हो  मुझे  वास्ता
अब जो है ही नही कैसे डर जाऊं
 
मौत आगे खड़ी पीछे ग़म की झड़ी
अच्छा तुम ही कहो मैं किधर जाऊं

जिस्म  से  रूह  मेरी  जुदा हो  चली
एक नज़र उस को देखूँ तो मर जाऊं

अमित 'मौन'

4 comments:

  1. वाह ... अच्छे शेर हैं ग़ज़ल के ...

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    1. बेहद शुक्रिया आपका

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  2. वाआआह बहुत खूब कहा, बेहतरीन ग़ज़ल...

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    1. बेहद शुक्रिया आपका

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