Saturday, 2 October 2021

साथ

तुम और मैं एक दूसरे के बिल्कुल उलट थे। उतने ही अलग जितना जमीन और आसमान अलग हैं। फ़िर भी ये आसमान हर कदम जमीन के साथ चलता है बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं और तुम साथ चला करते थे। हमें लगता है दूर कहीं किसी छोर पर ये आसमान और जमीन गले मिल रहे हैं वो भी बिना एक दूसरे का अस्तित्व मिटाए। और ऐसे ही एक दिन हम भी चलते चलते अपना छोर ढूंढ़ लेंगे।


तुम्हें उगते सूरज की चंचलता पसंद थी क्योंकि हर सुबह उठकर तुम्हे दुनिया के कुछ और रंग देखने की चाहत रहती थी। पर मुझे डूबते सूरज के सुकून का इंतज़ार रहा करता था जब हम अपनी थकान का बस्ता उतारकर फिर से उन अंधेरों में अपना उदास चेहरा छुपा सकते हैं।

कभी कभी हमारी आदतें हमारा भविष्य तय करती हैं या यूँ कहें कि हमारी आदतें हमें भविष्य के लिए तैयार करती हैं। हम जब तक सिर्फ़ कुछ ही रंगों के बारे में जानते हैं तब तक हमें अपना पसंदीदा रंग तय करने में मुश्किल नही होती पर जैसे जैसे हम कुछ और रंगों को जानना शुरू करते हैं वैसे वैसे हमें अपनी पसंद का रंग बताना मुश्किल लगने लगता है।

जीवन तब तक आसान रहता है जब तक हम कुछ ढूँढ़ना शुरू नही करते और जैसे ही हम तलाश शुरू करते हैं हमें पता चलता है कि एक चीज़ की तलाश दूसरे चीज़ की खोज पर ख़त्म होती है। हमारा लक्ष्य हमेशा अपना रूप बदलता रहता है और हम बस उसके पीछे भागते ही रहते हैं।

तितलियों का पीछा करती हुई अब तुम मेरी पहुँच से बहुत दूर जा चुकी हो। तुम्हें वो उपवन मिल गया है जहाँ ढेर सारी तितलियों के साथ रंग बिरंगे फूल भी हैं, और अंधेरों में रहते हुए अब मुझे रातों से लगाव हो गया है। मैं अब सुबहों से दूर रहना चाहता हूँ।

जमीन के उस छोर पर आकर जहाँ से समंदर शुरू होता है मैं ये तो जान गया हूँ कि ये आसमान और जमीन कहीं नही मिलते। ये साथ आने की चाहत जरूर रख सकते हैं पर साथ हो नही सकते।

- अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Wednesday, 29 September 2021

हर दुःख का अंत जरूरी है

ये उम्र बिखरती जाती है
मैं आस लगाए रखता हूँ
ना जाने कब एक आहट हो
मैं नैन बिछाए रखता हूँ

यूँ तन्हा यार रहूँ कब तक
ये दर्द, ये टीस सहूँ कब तक
इन सीलन भरी हवाओं से
ये दुखड़े यार कहूँ कब तक

अब इंतज़ार की घड़ियों ने भी
वक़्त बताना छोड़ दिया
रस्ता तकते इस ऐनक को
अश्क़ों ने बह कर तोड़ दिया

माना कि तुम में और मुझ में
अब भी मीलों की दूरी है
पर रात की सुबह तो निश्चित है
हर दुःख का अंत जरूरी है

अमित 'मौन'



P.C.: GOOGLE


Monday, 19 July 2021

दुनिया बहुत बड़ी है

 ये दुनिया अचानक इतनी बड़ी हो गयी है

कि तुम्हारी ख़बर तक नही मिलती
हर अख़बार, सभी चिट्ठी, सारे संदेश
कहीं भी तुम्हारी ख़ुशबू तक नही है

अब दिन मानों सदियों से हो गए हैं
और वक़्त के तो जैसे पंख कट गए हैं
अब नींदें ख़्वाबों से डरने लगी हैं
और इच्छाएं बेमौत मरने लगी हैं

मैं इंतज़ार का कैदी हो गया हूँ
और अंधेरों में जकड़ा हुआ हूँ
अब साँसों का खर्चा उम्मीदें उठाती हैं
और मैं इस जिस्म का बोझ ढोता हूँ

तुम थी तो सब कितना आसान था

दिन यूँ ही पलों में गुज़र जाया करते थे
हम मुठ्ठी में आसमान ले आया करते थे

किनारों पर बैठ कर समंदर नापना हो
या इंद्रधनुष से कोई रंग छाँटना हो
दुनिया सिर्फ़ उस छोर तक सिमटी थी
जहाँ हम हाथ बढ़ाकर पहुँचा करते थे

सपने रोज जन्म लिया करते थे
हम वादों से अपनी जेबें भरते थे
हम घड़ी को कलाई में बाँध कर रखते थे
और वक़्त हाथ छुड़ा कर भाग जाता था

फ़िर एक दिन समय तुम्हें साथ ले गया
और हाथों में इतंज़ार की लकीरें दे गया
अब मन और मुट्ठी दोनों खाली है
बस ये आँखें हैं जो भरी हुई हैं

इन सबके बीच मैं इतना तो जान गया हूँ कि
अकेले रहने के लिए ये दुनिया बहुत बड़ी है
और साथ रहने की उम्र बहुत कम है।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Thursday, 15 July 2021

सबक का मोती

 जो तारे टूट जाते हैं

वो फ़िर कभी नही जुड़ पाते
जब जुगनू मरते हैं
तो उनकी रोशनी भी मर जाती है
किसी अपने से बिछड़ने के बाद
जब जीवन करवट बदलता है
तब सैकड़ों सूरज मिलकर भी
कोनों का अंधकार नही मिटा पाते

कई बार हम ऐसी गलती कर जाते हैं
कि दुःखों के लिए स्वयं दरवाजे खोल आते हैं
हम मंगल पर जाकर यान उतार सकते हैं
पर अतीत में जाकर गलतियाँ नही सुधार सकते
शायद पीछे मुड़ना आगे बढ़ने से ज्यादा मुश्किल होता है

जब कोई ख़ुशी अलविदा कहती है
तो अपने साथ अपना हिस्सा ले जाती है
अब इसे एक विडंबना कह सकते हैं कि
हम साथ बिताए पलों को तो कैद कर लेते हैं
पर उन पलों के साथी को नही रोक पाते

लेकिन पछतावे में डूब कर भी
सबक का मोती निकाला जा सकता है
सिर्फ़ कुछ खोकर ही
बहुत कुछ खोने के दुःख से बचा जा सकता है
पीछे गिरकर आगे संभल जाना
मुश्किलें कम कर देता है।

अमित 'मौन'


P.C. : GOOGLE


Wednesday, 2 June 2021

पक्ष

गीता ग्रंथ सी होती है ये अंतरात्मा
हमेशा अच्छे बुरे का उपदेश देती हुई
पर मन अक़्सर दुर्योधन सा आतुर 
जो सोच लिया वो करके ही मानता है

हर चोर जानता है चोरी के पाप को
फ़िर भी वो करता रहता है चोरियाँ
क्योंकि पाप और प्रायश्चित के बीच
उसे फल चुनना आसान लगता है

जन्म से हम जानवर होंगे या मानव
ये कभी भी हमारे हाथ में नही होता
जन्म पाने के लिए कर्म नही कर सकते
पर जन्म के बाद अपना कर्म चुन सकते हैं

ये जानते हुए भी कि जीव हत्या पाप है
साँप को विष और शेर को दाँत क्यों ?
क्योंकि अस्तित्व की जद्दोजहद को
पाप पुण्य की तराजू में नही रखा जाता

सुख दुःख बादल हैं, आते जाते रहेंगे
पर संतुष्टि की छाँव हम स्वयं ढूँढ़ते हैं
हमें परिस्थितियाँ चुनने की आज़ादी नही
पर हम निर्णय के लिए सदैव स्वतंत्र हैं

मानवता स्वयं में एक ऐसा धर्म है
जिसका ईश्वर और प्रजा हम ही हैं
हम ही चोट देंगे हम ही दर्द सहेंगे
हम ही दुनिया बनाएंगे हम ही रहेंगे

जीवन एक खेल है जो हम खेलते हैं
यहाँ खिलाड़ी भी हम और दर्शक भी
अच्छाई और बुराई दो अलग दल हैं
हमें पक्ष चुनना और खेलना भर है

- अमित 'मौन'
PC: Google

Wednesday, 28 April 2021

इच्छाशक्ति जगाए रखना

यह समय बड़ा ही मुश्किल है
भारी  भारी  सा  हर  पल   है
तुम ईश का ध्यान लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

युद्ध  बड़ा  जब  लड़ना  हो
ताकतवर से जब भिड़ना हो
तुम पूरा जोर लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब गति हृदय की बढ़ जाए
जब श्वास श्वास पर चढ़ जाए
जीने की आस लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब मन का सूरज घटता हो
और डर का साया बढ़ता हो
अपनों को गले लगाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

जब समय उचित आ जाता है
दानव  का  वध  हो  जाता  है
बस मानव धर्म बचाए रखना
इच्छाशक्ति  जगाए  रखना

अमित 'मौन'

Wednesday, 31 March 2021

रश्क़

 रोज इसी वक़्त छत पर आओगी

तो पड़ोसी कानाफ़ूसी करेंगे
पकड़ी तुम जाओगी
और शामत मेरी आएगी

बिन बात मुस्कुराती हो
बेवज़ह चौंक जाती हो
जो किसी को भी शक हुआ
अपनी जासूसी हो जाएगी

अब आ ही गयी हो
तो बालों को खुला छोड़ो
चूम के ऊँगली उछाली है मैंने
गालों से ज़ुल्फें हवा उड़ाएगी

रोज रोज चुनर लहराओगी
तो बादलों को तकलीफ़ होगी
वो गुस्से में बड़बड़ाएंगे
और बारिश हो जाएगी

इन बालियों को कहो
इतना भी ना चमकें
कहीं सूरज जल गया अगर
मोहल्ले में रोशनी ना आएगी

यूँ जोर जोर गुनगुनाओगी
तो कोयल को रश्क़ होगा
वो बिगड़ी तो महीनों तक
फ़िर प्रेम गीत ना सुनाएगी

सोचो किसी शाम ऐसा भी हो
तुम आओ और मैं ना मिलूँ
बमुश्किल रात कटेगी तुम्हारी
बेचैनी रहेगी, नींद नही आएगी

मैंने तो लिख दी है कविता
अब तुम भी एक चिट्ठी लिखो
कब तक तुम्हारे दिल का हाल
मुझसे तुम्हारी सहेली बताएगी।

अमित 'मौन'


P.C.: GOOGLE


Tuesday, 2 March 2021

परफ्यूम

'मैं तो यही चाहूँगी कि हम बीच बीच में मिलते रहें, बाकी तुम्हारी मर्जी' ये उसकी आख़िरी लाइन थी जो मेरे कानों ने सुनी थी। उसके बाद हम कभी नही मिले।

एक आम आशिक़ की तरह मैंने भी कई बार उससे कहा था कि तुम आँखों से जादू टोना करती हो क्योंकि मैं जब भी इन्हें देखता हूँ बस खो जाता हूँ। सच बताऊँ तो उसकी आँखों को मैंने इतनी शिद्दत से देखा है कि उनका जादू मेरी आँखों में उतर आया है। मैं जब भी अपनी आँखें बंद करता हूँ तो उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है। कई बार हम खुली आँखों से उतना सब नही देख पाते जितना आँखें बंद करके देख लेते हैं।

उसे सिगरेट से सख़्त नफ़रत थी और उसके जाने के बाद मैंने पीना ज्यादा कर दिया। जलती सिगरेट की चिंगारी देख मुझे यूँ लगता जैसे ये आग नही मैं उसका दिल जला रहा हूँ। इधर सिगरेट ख़त्म होती उधर मेरे बदले की भावना। कई बार आग सिर्फ़ जलाने के नही बुझाने के काम भी आती है।

मैंने बोलना बंद कर दिया था क्योंकि मैं चीखना चाहता था और चीखने वाले को पागल घोषित कर दिया जाता है। मैं पागल नही था बल्कि मैं तो अब पागलपन के दौर से बाहर आया था। कई बार हम किसी इंसान के इतने अंदर समा जाते हैं कि उसके बाहर हमें कुछ दिखाई देना बंद हो जाता है। फ़िर एक दिन बेहोशी टूटती है और हम ख़ुद को बीच सड़क पर पड़ा हुआ पाते हैं। पर उस दिन कोई हमें उठाने वाला नही होता क्योंकि इस दुनिया का उसूल है कि यहाँ गिरते हुए को संभालने वाले तो मिल जाएंगे पर जो गिरा है उसे उठाने के लिए कोई नही झुकना चाहता। मैंने ख़ुद को संभाला भी है और उठकर आगे भी चल पड़ा हूँ।

ख़ैर मेरे नंगे पाँव अब उस नर्म घास पर कभी नही चलना चाहते। उस जमीन पर चुभे काँटों के घाव अब सूख चुके हैं।

ये सारा दोष इस परफ्यूम की शीशी का है जो पता नही कैसे बची रह गयी और मुझे ये सब याद दिला गयी। शायद उसके जाने के बाद मैंने कभी परफ्यूम नही लगाया।

अमित 'मौन'


P.C. : GOOGLE


आख़िरी तर्क: प्रेम

उपन्यास-   आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...