Welcome to my Blog. I write what i saw & learn from life. Because: जो पढ़ा किताबों में, अमल में लाऊं भी तो क्या, ये जिंदगी है जनाब, फलसफ़ों से नही चलती.... Suggestions/appreciations in comment box are always welcomed. You can also read my latest writing at the following link: www.yourquote.in/amitmaun
Sunday, 11 October 2020
बदलाव
Wednesday, 7 October 2020
शब्दविहीन
एक बात के कई मतलब निकालने वाली इस दुनिया ने कई बार उन शब्दों के भी मतलब निकालने चाहे जिनका अर्थ समझाने के लिए शब्द बन ही नही सके। कई बार हम समझ ही नही पाते कि कुछ अर्थों को शब्दों से नही भावनाओं से समझा जाता है।
हम बहुत ख़ुश होते हैं तो ख़ुशी बयान नही कर पाते और दुःखी होते हैं पर दुःख व्यक्त नही कर सकते।ख़ुशी क्या होती है ये अपने पहले बच्चे को गोद में लेने के बाद पता चलता है और दुःख क्या होता है ये उस स्त्री से बेहतर कौन जान सकता है जिसने मंगलसूत्र पहनने का सौभाग्य खो दिया हो।
निराशा किसे कहते हैं ये उस किसान को मालूम है जिसको महीनों की मेहनत के बाद भी लहलहाती फ़सल देखना नसीब नही हुआ और चिंता भला उस पिता से बेहतर कौन जानेगा जिसकी बेटी की उम्र समाज के हिसाब से हाथ पीले करने की हो गयी हो।
गर्व करने के लिए आपको उस सिपाही का पिता बनना पड़ेगा जिसके बेटे को देश की सेवा के लिए एक विशेष समारोह में सम्मान मिल रहा हो और शर्मिंदगी का अनुभव एक अपराधी का परिवार जानता है।
दया भाव को वही महसूस कर सका है जिसने दर्द से कराह रहे किसी बेजुबान जानवर को सड़क से उठा कर उसका इलाज किया हो और समर्पण को वही समझ सका जिसने किसी के कंधे पर सर रखकर आँखें मूंद ली हों।
तुमसे मिलकर मैंने जाना कि पाने की ख़ुशी क्या होती है और तुम्हारे जाते ही मैंने खोने की पीड़ा को समझा।
हम ज़िंदगी को जितना करीब से जानने की कोशिश करते हैं उतना ही ख़ुद को शब्दविहीन पाते हैं। हम देखी-सुनी बातों को भले ही कविता या कहानी में ढालने में सक्षम हों पर अनुभवों को लिखने के लिए हमें कभी भी सटीक शब्द नही मिल पाते। हम कितना भी लिख लें पर आख़िरी पंक्ति के बाद भी बहुत कुछ छूट गया लगता है।
कुछ बातें अपने कहे जाने के इंतज़ार में दम तोड़ देती हैं।
अमित 'मौन'
Sunday, 27 September 2020
आखेट
Tuesday, 15 September 2020
दूरियाँ
कभी कभी लगता है कि थोड़ी दूरी भी बहुत ज्यादा दूरी होती है। फ़िर लगता है कि दूरी तो दूरी है उसमें थोड़ी और ज्यादा की कोई गुंजाइश नही होती। मन कहता है कि तुम बस जरा सी दूर हो, मैं हाथ बढ़ा कर तुम्हे छूना चाहता हूँ पर मेरे हाथ तुम तक नही पहुँच पाते। तुम बहुत दूर लगने लगती हो, लगता है जैसे मैं तुम तक कभी पहुँच ही नही पाऊंगा।
हमारे बीच एक खाई है जिसे पार नही किया जा सकता, पर मैंने फ़िर भी हार नही मानी है। मैं एक पुल बनाने की कोशिश में लगा हूँ। मैं इतने सालों से पुल बना रहा हूँ पर उस पुल का दूसरा सिरा तुम तक पहुँच नही रहा। शायद मैं अच्छा इंजीनियर नही हूँ या हो सकता है मेरे पुल तैयार करते वक़्त ये खाई और लंबी हो गयी हो।
कुछ दूरियाँ इतनी दूर होती हैं कि कभी तय नही हो पाती।
अमित 'मौन'
Saturday, 12 September 2020
इंतज़ार
कभी कभी लगता है कि अब आगे बढ़ जाना चाहिए। अब यहाँ रुकने का कोई औचित्य नही है। ऐसा कुछ नही है जिसके लिए रुका जाए। मैं गठरी बाँध कर आगे बढ़ने ही वाला होता हूँ कि एक ख़्याल आता है जो कहता है कि अगर तुम वापस आयी और मैं यहाँ ना मिला तो क्या होगा, तुम क्या सोचोगी, कहीं तुम मुझे गलत तो नही समझोगी। कहीं तुम ये ना सोचो कि मैंने इंतज़ार ही नही किया।
सिर्फ़ इतनी सी बात सोचकर मेरे कदम आगे बढ़ ही नही पाते। मेरी आत्मा मेरे शरीर से निकल कर वहीं बैठ जाती है। मेरा शरीर चाह कर भी आगे नही जा पाता। मैं जानता हूँ की इंतज़ार की एक अवधि होती है। एक तय समय के बाद किया गया इंतज़ार पहले निराशा और फ़िर अवसाद में बदल जाता है।
मैं सब समझता हूँ पर फ़िर भी सोचता हूँ कि मेरे इंतज़ार की समय सीमा कौन निर्धारित करेगा? कम से कम इतना हक़ तो मैं अपने पास रख ही सकता हूँ। यही सोचकर मैं हर बार इस अवधि को बढ़ाता चला जाता हूँ। मैं जानता हूँ कि अवधि बढ़ाने के बाद भी एक दिन ऐसा आएगा जब मुझे ही बढ़ना पड़ेगा पर मैं फ़िर से तुम्हारे बारे में सोच लेता हूँ।
मैं जीवन के उस मोड़ पर खड़ा हूँ जहाँ मेरी सोचने की शक्ति, मेरे समझने की क्षमता पर हावी हो चुकी है। मैं कितना कुछ सोच रहा हूँ पर समझने को तैयार नही हूँ।
अमित 'मौन'
Monday, 24 August 2020
और फ़िर ऐसे समय में
आज खोया आसमां है
डूबी जाए अब धरा है।
आँसुओं की उठती लहरें
नयन का सागर भरा है
शूल बन कर चुभती यादें
घाव अब तक वो हरा है।
और फ़िर ऐसे समय में
आ बसी हो तुम हृदय में
अस्त होती हैं उम्मीदें
कोई रुचि है ना उदय में।
घटती साँसें पूछे मुझसे
वक्त कितना है प्रलय में
शून्य जीवन करके भी तुम
क्यों रुकी हो अब हृदय में।
क्यों रुकी हो अब हृदय में...
अमित 'मौन'
Thursday, 20 August 2020
लौटना जरूरी है
जाना ज़रूरी होता है ना चाहते हुए भी
ठीक वैसे ही जैसे जीना ज़रूरी होता हैबिना किसी जरूरत के भी।
लौट आना भी उतना ही ज़रूरी है
जितना लौटने की उम्मीद लगाए रखना
तुम भी लौट आना एक दिन
उम्मीदों की उम्र लंबी रहेगी।
लौट आना तुम भी ठीक वैसे ही
जैसे बुढ़िया लौटती है अपनी खाट पर
जैसे नदी लौट आती है अपने घाट पर।
लौट आना तुम भी ठीक उसी तरह
जैसे मुंडन के बाद लौटता है बाल
जैसे सावन लौट आता है हर साल।
तुम्हे लौटना होगा ठीक वैसे ही
जैसे खिलौना मिलने पर
लौट आती है बच्चे की मुस्कान
जैसे प्रार्थना करने पर
ख़ुशियाँ लौटा देता है भगवान।
हाँ तुम्हे लौटना ही होगा
क्योंकि लौटना जरूरी है
जाने से कहीं ज्यादा जरूरी।
अमित 'मौन'
Monday, 10 August 2020
ऐसा भी क्या बिगड़ा है
ये जो प्यारा मुखड़ा है
क्यों ऐसे उखड़ा उखड़ा है
प्यार, मोहब्बत और ये शिक़वे
हर प्राणी का दुखड़ा है
नही अकेला तू ही भोगी
सबको ग़म ने रगड़ा है
कौन सही है कौन ग़लत है
सदियों से ये झगड़ा है
छोड़ उदासी ख़ुशी ओढ़ ले
दुःख क्यों कस के पकड़ा है
हँसी सजा ले चेहरे पर क्यों
गुस्से में यूँ अकड़ा है
शेष अभी है पूरा जीवन
ऐसा भी क्या बिगड़ा है
अमित 'मौन'
Thursday, 30 July 2020
प्रेमिका
Tuesday, 28 July 2020
समय
आख़िरी तर्क: प्रेम
उपन्यास- आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...
-
अगर मुझे मनुष्य होना सीखना हो तो मैं तुम्हारे मौन से शुरू करूँगा जहाँ करुणा किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती। अगर मुझे कोई प्रश्न सताने लगे त...
-
यूँ ही कल झाड़ पोंछ में ज़हन की वक़्त की दराज़ से निकल आये कुछ ख़्याल पुराने जो कहने थे उनसे जो मौजूद नही थे सुनने के लिए.... कुछ ख़त जो लि...
-
उपन्यास- आख़िरी तर्क : प्रेम अध्याय 1: वह शाम और भीतर का अँधेरा उस शाम की बारिश में कुछ अलग था। आमतौर पर बारिश ...




